मायाध्यक्षेण प्रकृतिः
सूयते सच्चराचरं
हेतुनाननेन कौन्तेय
जगद् विपरिवर्तते
"हे कुन्ती के पुत्र, यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य करती हुई सभी चल-अचल प्राणियों को जन्म देती है। इसके नियम से सृष्टि का निर्माण और विनाश बार-बार होता है।" भौतिक ऊर्जा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति का सृजन, पालन और विनाश उस परम पुरुषोत्तम की दी हुई दिशाओं के कारण करती है, जो इस ब्रह्माण्ड में गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में प्रवेश करते हैं किन्तु उस पर भौतिक गुणों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भगवद-गीता में प्रभु माया, बाहरी ऊर्जा, जो इस भौतिक जगत का सृजन करती है, को माम माया, "मेरी ऊर्जा" के रूप में संदर्भित करते हैं, क्योंकि यह ऊर्जा प्रभु के पूर्ण नियंत्रण में कार्य करती है। ये तथ्य केवल उन लोगों द्वारा ही समझें जा सकते हैं जो वैदिक ज्ञान में निपुण और कृष्ण चेतना में उन्नत हों।
