श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  8.5.49 
यथा हि स्कन्धशाखानां तरोर्मूलावसेचनम् ।
एवमाराधनं विष्णो: सर्वेषामात्मनश्च हि ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
जब वृक्ष की जड़ में जल डाला जाता है, तो वृक्ष का तना और शाखाएँ स्वतः ही प्रसन्न हो जाती हैं। इसी प्रकार, जब कोई भगवान विष्णु का भक्त बनता है, तो इससे प्रत्येक व्यक्ति की सेवा हो जाती है, क्योंकि भगवान सभी के परमात्मा हैं।
 
When water is poured at the root of a tree, the trunk and branches of the tree automatically become satisfied. Similarly, when one becomes a devotee of Lord Vishnu, this serves everyone because the Lord is the Supreme Being of everyone.
तात्पर्य
जैसा कि पद्म पुराण में कहा गया है:

आरारधाननां सर्वेषां

विष्णोर आरारधनं परं

तस्मात परतरं देवि

तदीयानां समर्चा

"पूजा के सभी प्रकारों में, भगवान विष्णु की पूजा सर्वश्रेष्ठ है, और भगवान विष्णु की पूजा से भी बेहतर उनके भक्त, वैष्णव की पूजा है।" कई देवता हैं जो उन लोगों द्वारा पूजे जाते हैं जो भौतिक इच्छाओं (कामैस्तैस्तैहृत ज्ञानाः प्रपदयन्तेऽन्य-देवताः) से जुड़े होते हैं। क्योंकि लोग इतनी सारी भौतिक इच्छाओं से शर्मिंदा होते हैं, वे विभिन्न परिणाम प्राप्त करने के लिए भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा, देवी काली, दुर्गा, गणेश और सूर्य की पूजा करते हैं। हालाँकि, केवल भगवान विष्णु की पूजा करके सभी परिणाम एक साथ प्राप्त किए जा सकते हैं। जैसा कि भागवत (4.31.14) में किसी अन्य स्थान पर कहा गया है:

यथा तरोर्मूल-निषेचनेन

तृप्यन्ति तत्-स्कन्ध-भुजोपशाखाः

प्राणोपहाराच्च यथेंद्रियाणां

तथैव सर्वार्हणम च्युतेज्या

"बस एक पेड़ की जड़ पर पानी डालने से, कोई उसके तने और उसकी सभी शाखाओं, फलों और फूलों का पोषण करता है, और बस पेट को भोजन देने से, कोई शरीर के सभी अंगों को संतुष्ट करता है। इसी तरह, भगवान विष्णु की पूजा करके कोई भी सभी को संतुष्ट कर सकता है।" कृष्ण चेतना एक सांप्रदायिक धार्मिक आंदोलन नहीं है। बल्कि, इसका उद्देश्य विश्व के लिए सभी कल्याणकारी गतिविधियाँ हैं। कोई भी जाति, पंथ, धर्म या राष्ट्रीयता के भेदभाव के बिना इस आंदोलन में प्रवेश कर सकता है। यदि कोई सर्वोच्च भगवान, कृष्ण की पूजा करने के लिए प्रशिक्षित है, जो विष्णु-तत्व के मूल हैं, तो वह सभी प्रकार से पूरी तरह से संतुष्ट और परिपूर्ण हो सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)