श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  8.5.48 
नावम: कर्मकल्पोऽपि विफलायेश्वरार्पित: ।
कल्पते पुरुषस्यैव स ह्यात्मा दयितो हित: ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान को समर्पित प्रयास, फिर चाहे वे छोटे ही क्यों न हो, व्यर्थ नहीं जाते। परम पिता होने के कारण भगवान हमारे बहुत करीब हैं और जीवों के कल्याण के लिए हर समय कार्य करने को तैयार रहते हैं।
 
Activities dedicated to the Lord, even if done on a small scale, are never wasted. Therefore, it is natural that the Lord, being the Supreme Father, is very dear and He is always ready to perform activities for the welfare of the living entities.
तात्पर्य
भगवद्-गीता (2.40) में भगवान कहते हैं स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्: यह धर्म, भक्तिमय सेवा बहुत महत्वपूर्ण है कि अगर इसे बहुत छोटे, नगण्य रूप में भी किया जाए, तो इससे व्यक्ति को सर्वोच्च परिणाम प्राप्त होता है। विश्व के इतिहास में कई उदाहरण हैं कि भगवान की थोड़ी सी भी सेवा ने जीवन-सत्ता को सबसे बड़े खतरे से बचाया है। उदाहरण के लिए अजामिल को परमेश्वर ने नरक जाने के सबसे बड़े खतरे से बचाया था। वह सिर्फ इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के अंत में नारायण नाम का जाप किया था। जब अजामिल ने भगवान के नारायण नाम का जाप किया, तो उन्होंने जान-बूझकर नहीं किया था; वास्तव में वो अपने सबसे छोटे बेटे को बुला रहे थे जिसका नाम नारायण था। इसके बावजूद भगवान नारायण ने इस जाप को गंभीरता से लिया और इस तरह अजामिल ने अंते नारायण-स्मृतिः के परिणाम को पाया, जीवन के अंत में नारायण को याद करना। अगर किसी तरह से जीवन के अंत में नारायण, कृष्ण या राम का नाम याद हो जाता है, तो वो तुरंत स्वर्ग में जाने, भगवान के पास लौटने के अलौकिक परिणाम को प्राप्त करता है।

परमेश्वर वास्तव में हमारे प्रेम का एकमात्र उद्देश्य है। जब तक हम इस भौतिक दुनिया में हैं, हमारी बहुत सारी इच्छाओं को पूरा करना है, पर जब हम परमेश्वर के संपर्क में आते हैं, तो हम तुरंत पूर्ण और पूरी तरह से संतुष्ट हो जाते हैं, जैसे एक बच्चा अपनी माँ की गोदी में आकर पूरी तरह से संतुष्ट हो जाता है। ध्रुव महाराज कठोर तपस्या और उपवास से कुछ भौतिक परिणाम प्राप्त करने के लिए जंगल गए थे, पर जब उन्होंने परमेश्वर को वास्तव में देखा, तो उन्होंने कहा, ''मुझे कोई भौतिक वरदान नहीं चाहिए। मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ।'' भगवान की सेवा से भौतिक लाभ अगर कोई चाहता है, तो ये बिना कठोर परिश्रम के आसानी से पाया जा सकता है। इसलिए शास्त्र सलाह देते हैं:

अकामः सर्व-कामो वा

मोक्ष-कामो उदार-धीः

तीव्रेण भक्ति-योगेन

यजेत पुरुषं परम

''कोई सब कुछ चाहता है या कुछ नहीं चाहता है या यह चाहता है कि भगवान के अस्तित्व में मिल जाए, वह तभी बुद्धिमान होता है जब वह प्रेममय भक्ति-सेवा करके भगवान श्री कृष्ण, परमेश्वर की उपासना करता है। (भा. 2.3.10) अगर किसी की भौतिक इच्छाएँ हैं, तो वह भगवान की सेवा करके निश्चित रूप से वो पा सकता है जो वो चाहता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)