परमेश्वर वास्तव में हमारे प्रेम का एकमात्र उद्देश्य है। जब तक हम इस भौतिक दुनिया में हैं, हमारी बहुत सारी इच्छाओं को पूरा करना है, पर जब हम परमेश्वर के संपर्क में आते हैं, तो हम तुरंत पूर्ण और पूरी तरह से संतुष्ट हो जाते हैं, जैसे एक बच्चा अपनी माँ की गोदी में आकर पूरी तरह से संतुष्ट हो जाता है। ध्रुव महाराज कठोर तपस्या और उपवास से कुछ भौतिक परिणाम प्राप्त करने के लिए जंगल गए थे, पर जब उन्होंने परमेश्वर को वास्तव में देखा, तो उन्होंने कहा, ''मुझे कोई भौतिक वरदान नहीं चाहिए। मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ।'' भगवान की सेवा से भौतिक लाभ अगर कोई चाहता है, तो ये बिना कठोर परिश्रम के आसानी से पाया जा सकता है। इसलिए शास्त्र सलाह देते हैं:
अकामः सर्व-कामो वा
मोक्ष-कामो उदार-धीः
तीव्रेण भक्ति-योगेन
यजेत पुरुषं परम
''कोई सब कुछ चाहता है या कुछ नहीं चाहता है या यह चाहता है कि भगवान के अस्तित्व में मिल जाए, वह तभी बुद्धिमान होता है जब वह प्रेममय भक्ति-सेवा करके भगवान श्री कृष्ण, परमेश्वर की उपासना करता है। (भा. 2.3.10) अगर किसी की भौतिक इच्छाएँ हैं, तो वह भगवान की सेवा करके निश्चित रूप से वो पा सकता है जो वो चाहता है।
