श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  8.5.47 
क्लेशभूर्यल्पसाराणि कर्माणि विफलानि वा ।
देहिनां विषयार्तानां न तथैवार्पितं त्वयि ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
कर्मीजन अपनी इन्द्रिय सुखों की पूर्ति के लिए हमेशा धन इकट्ठा करने के लिए लालायित रहते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। इतनी कठोर मेहनत के बावजूद भी उन्हें संतोषजनक परिणाम नहीं मिलते। निस्संदेह, कभी-कभी तो उनके काम के नतीजों से निराशा ही हाथ लगती है। लेकिन जो भक्त अपने जीवन को ईश्वर की सेवा में समर्पित कर देते हैं, वे बहुत कड़ी मेहनत किए बिना ही पर्याप्त परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। ये परिणाम भक्तों की अपेक्षाओं से भी बढ़कर होते हैं।
 
Karmcharis are always eager to accumulate wealth for their sense gratification, but for this they have to work very hard. Despite such hard work they do not get satisfactory results. Undoubtedly sometimes their karma-fruits lead to disappointment. But devotees who have dedicated their lives to the service of the Lord can get sufficient fruits without doing hard work. These fruits are beyond the expectations of the devotees.
तात्पर्य
हम व्यावहारिक रूप से देख सकते हैं कि कृष्ण भावनामृत आन्दोलन में प्रभु की सेवा के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वाले भक्त किस प्रकार कठिन प्रयास किये बिना श्रीभगवान की परम आराधना का अपार अवसर पा रहे हैं। कृष्ण भावनामृत आन्दोलन की शुरुआत मात्र 40 रूपयों से हुई थी, पर अब इस आन्दोलन की 40 करोड़ से भी ऊपर की सम्पत्ति है और यह सारा ऐश्वर्य आठ से दस साल के अन्दर अर्जित किया गया है। कोई भी कर्मी इतनी तेजी से अपने व्यापार में वृद्धि होने की अपेक्षा नहीं कर सकता और उसके अतिरिक्त, कर्मियों द्वारा अर्जित किया गया धन अस्थायी होता है और कई बार उससे निराशा ही हाथ लगती है। हालाँकि, कृष्ण भावनामृत आन्दोलन में सब कुछ प्रसन्नता दायक और उन्नतिशील है। कृष्ण भावनामृत आन्दोलन का कर्मियों के बीच विशेष रूप से प्रचार नहीं होता क्योंकि यह आन्दोलन अनुचित यौन सम्बन्धों, मांसाहार, जुए और मादक पदार्थों के सेवन से दूर रहने की सलाह देता है। ये ऐसे प्रतिबंध हैं जिन्हें कर्मी अत्यधिक नापसंद करते हैं। इसके बावजूद शत्रुओं की भरमार होने पे भी यह आन्दोलन बिना किसी बाधा के विकास कर रहा है। यदि भक्त निरंतर इस आन्दोलन का प्रचार करते रहें, कृष्ण के चरण कमलों में अपने तन-मन को समर्पित करते रहें तो इस आन्दोलन को कोई नहीं रोक सकेगा। यह आन्दोलन असीमित रूप से बढ़ता रहेगा। हरि कृष्ण! हरि कृष्ण! बोलिये! हरि कृष्ण! हरि कृष्ण!
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)