यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम
"हे भरत के वंशज, जब भी और जहाँ भी धार्मिक आचरण में गिरावट होती है, और अधर्म का प्रबल उदय होता है -- उस समय मैं स्वयं अपने आप को अवतरित करता हूँ।" इस प्रकार यह एक कल्पना नहीं बल्कि एक तथ्य है कि ईश्वर का परम व्यक्तित्व, अपनी मधुर इच्छा से, मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, रामचंद्र, बलराम, बुद्ध और कई अन्य रूपों जैसे विभिन्न अवतारों में प्रकट होता है। भक्त हमेशा भगवान के असंख्य रूपों में से एक को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं। यह कहा जाता है कि जिस प्रकार कोई भी यह नहीं गिन सकता कि समुद्र में कितनी लहरें हैं, उसी प्रकार कोई भी भगवान के रूपों को नहीं गिन सकता। हालाँकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई भी खुद को भगवान का रूप होने का दावा कर सकता है और एक अवतार के रूप में स्वीकार्य हो सकता है। ईश्वर के परम व्यक्तित्व का अवतार शास्त्रों में पाए गए वर्णनों के अनुसार स्वीकार किया जाना चाहिए। भगवान ब्रह्मा भगवान के अवतार, या सभी अवतारों के मूल स्रोत को देखने के लिए उत्सुक हैं; वह किसी धोखेबाज को देखने के लिए उत्सुक नहीं हैं। अवतार की गतिविधियाँ उनकी पहचान का प्रमाण हैं। शास्त्रों में वर्णित सभी अवतार अद्भुत कार्य करते हैं (केशव धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे)। यह केवल ईश्वर के परम व्यक्तित्व की व्यक्तिगत मधुर इच्छा से ही है कि वह प्रकट होते हैं और फिर गायब हो जाते हैं, और केवल भाग्यशाली भक्त ही उनका आमने-सामने दर्शन करने की अपेक्षा कर सकते हैं।
