श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  8.5.44 
नमोऽस्तु तस्मा उपशान्तशक्तये
स्वाराज्यलाभप्रतिपूरितात्मने ।
गुणेषु मायारचितेषु वृत्तिभि-
र्न सज्जमानाय नभस्वदूतये ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
हम उस सर्वोच्च ईश्वर को शिरोधार्य प्रणाम करते हैं, जो पूर्णतः मौन हैं, प्रयासों से मुक्त हैं और अपनी उपलब्धियों से पूर्ण रूप से संतुष्ट हैं । वे अपनी इंद्रियों द्वारा भौतिक जगत की गतिविधियों से आसक्त नहीं होते । निसंदेह, इस भौतिक जगत में अपने लीलाओं को संपन्न करते हुए वे अनासक्त वायु की तरह ही रहते हैं ।
 
We offer our respectful obeisances unto the Lord, who is perfectly tranquil, free from effort, and fully satisfied with His attainments. He does not get involved in the activities of the material world through His senses. Indeed, while performing His pastimes in this material world, He remains like the detached wind.
तात्पर्य
हम बस यह आसानी से समझ सकते हैं कि भौतिक प्रकृति की क्रियाकलापों के पीछे परम प्रभु हैं, जिनके संकेतों के द्वारा सब कुछ घटित होता है, यद्यपि हम उन्हें देख नहीं सकते। उन्हें देखे बिना भी, हमें उन्हें अपना आदरपूर्वक प्रणाम अर्पित करना चाहिए। हमें पता होना चाहिए कि वे पूर्ण हैं। सब कुछ उनकी ऊर्जाओं के द्वारा व्यवस्थित रूप से किया जाता है (परास्य शक्तिर विविधैव श्रूयते), और इसलिए उन्हें कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है (न तस्य कार्यं करणं च विद्यते)। जैसे कि यहाँ उपशांत-शक्तये शब्द द्वारा निर्देशित किया गया है, उनकी विभिन्न ऊर्जाएँ काम करती हैं, लेकिन यद्यपि वे इन ऊर्जाओं को क्रियान्वित करते हैं, परंतु उनका स्वयं कुछ भी करना नहीं होता है। वे किसी भी चीज़ से जुड़े नहीं हैं, क्योंकि वे परम भगवान हैं। इसलिए, आइए हम उन्हें अपना आदरपूर्वक प्रणाम अर्पित करें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)