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bhagavat 8.5.38: परम शक्तिशाली भगवान् हमसे प्रसन्न रहें। कान उनकी विभिन्न दिशाओं को उत्पन्न करते हैं, दिल शरीर के छिद्रों को, और नाभि प्राण, इंद्रियां, मन, शरीर के भीतर की वायु और शरीर को आश्रय देने वाला आकाश उत्पन्न करती है।   |   bhagavat अध्याय 8.5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना   ।   bhagavat स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  8.5.38 
श्रोत्राद् दिशो यस्य हृदश्च खानि
प्रजज्ञिरे खं पुरुषस्य नाभ्या: ।
प्राणेन्द्रियात्मासुशरीरकेत:
प्रसीदतां न: स महाविभूति: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
परम शक्तिशाली भगवान् हमसे प्रसन्न रहें। कान उनकी विभिन्न दिशाओं को उत्पन्न करते हैं, दिल शरीर के छिद्रों को, और नाभि प्राण, इंद्रियां, मन, शरीर के भीतर की वायु और शरीर को आश्रय देने वाला आकाश उत्पन्न करती है।
 
May the Almighty God be pleased with us. The various directions emerge from His ears, the pores of the body emerge from His heart and the life force, the senses, the mind, the air within the body and the void (sky) which is the shelter of the body emerge from His navel.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)