यद्-चक्षुरेष सवितृ सकल-ग्रहाणां
राजा समस्त-सुर-मूर्तिरशेष-तेजः
यस्याज्ञया भ्रमति संभृत-काल-चक्रो
गोविंदम आदि-पुरुषं तमहम भजामि
“असीम तेज से भरा सूर्य, सभी ग्रहों का राजा है और अच्छे आत्मा की प्रतिमा है। सूर्य परम भगवान की आँख की तरह है। मैं आदि-पुरुष गोविंद की पूजा करता हूँ, जिनके आदेश का पालन करते हुए सूर्य समय के पहिए पर चढ़कर अपनी यात्रा करते हैं।” सूर्य वास्तव में भगवान की आँख है। वैदिक मंत्रों में कहा गया है कि जब तक भगवान सर्वोच्च व्यक्ति स्वयं नहीं देखते, तब तक कोई नहीं देख सकता। जब तक सूर्य का प्रकाश न हो, तब तक किसी भी ग्रह पर रहने वाला कोई भी जीव नहीं देख सकता। इसलिए सूर्य को भगवान का ही नेत्र माना जाता है। यहाँ यद्-चक्षुर ासित शब्द और ब्रह्म-संहिता में यद्-चक्षुरेष सवितृ शब्दों द्वारा इसकी पुष्टि की गई है। सवितृ शब्द का अर्थ है सूर्य-देव।
