श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  8.5.33 
अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं
सिध्यन्ति जीवन्त्युत वर्धमाना: ।
लोकायतोऽथाखिललोकपाला:
प्रसीदतां न: स महाविभूति: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति जल से हुई है और जल का कारण ही सारे जीव स्थित हैं, जीवित रहते हैं और विकसित होते हैं। यह जल भगवान के वीर्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसलिए इतनी महान शक्ति रखने वाले भगवान हम पर प्रसन्न हों।
 
The whole universe has emerged from water and it is because of water that all living beings exist, live and grow. This water is nothing but the semen of God. Therefore, may God who has such great power be pleased with us.
तात्पर्य
तथाकथित वैज्ञानिकों के सिद्धांतों के बावजूद, इस ग्रह पर और अन्य ग्रहों पर पानी की विशाल मात्रा हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिश्रण से नहीं बनती है। इसके विपरीत, पानी को कभी-कभी पसीना और कभी-कभी परम भगवान का वीर्य बताया जाता है। यह पानी से ही है कि सभी जीवित प्राणी उत्पन्न होते हैं, और पानी के कारण ही वे रहते हैं और बढ़ते हैं। यदि पानी न होता तो सारा जीवन समाप्त हो जाता। पानी हर किसी के लिए जीवन का स्रोत है। इसलिए, भगवान की कृपा से, हमारे पास पूरी दुनिया में इतना पानी है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)