श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  8.5.32 
पादौ महीयं स्वकृतैव यस्य
चतुर्विधो यत्र हि भूतसर्ग: ।
स वै महापूरुष आत्मतन्त्र:
प्रसीदतां ब्रह्म महाविभूति: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
इस धरती पर चार तरह के जीव हैं, जिन्हें उन्होंने बनाया है। पदार्थों से बनी सृष्टि उनके चरणकमलों पर टिकी हुई है। वे महान परम पुरुष हैं और ऐश्वर्य और शक्ति से भरे हुए हैं। वे हम पर प्रसन्न रहें।
 
There are four kinds of living entities on this earth and all of them have been created by Him. This material creation rests on His lotus feet. He is the Supreme Being, full of opulence and power. May He be pleased with us.
तात्पर्य
मही शब्द पाँच भौतिक तत्वों - पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश - को दर्शाता है, जो भगवान के चरणकमलों पर स्थित हैं। महात्-पदम् पुण्य-यशो मुरारेः । महात्-तत्त्व, सकल भौतिक ऊर्जा, उनके चरणकमलों पर स्थित है, क्योंकि ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति भगवान की एक और संपत्ति है। इस ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति में चार प्रकार के जीव हैं - जरायु-जा (मातृगर्भ से जन्मे), अंड-जा (अंडों से जन्मे), स्वेद-जा (पसीने से जन्मे), और उदभिज-जा (बीजों से जन्मे)। सब कुछ भगवान से ही उत्पन्न होता है, जैसा कि वेदांत-सूत्र (जनमाद्य अस्य यत:) में पुष्टि की गई है। कोई भी स्वतंत्र नहीं है, लेकिन सर्वोच्च आत्मा पूरी तरह से स्वतंत्र है। जनमाद्य अस्य यतोऽन्वयाद इतरातश्चार्थेषु अभिज्ञः स्व-राट । स्व-राट शब्द का अर्थ है "स्वतंत्र"। हम आश्रित हैं, जबकि सर्वोच्च भगवान पूर्णतः स्वतंत्र हैं। इसलिए सर्वोच्च भगवान सबसे महान हैं। यहाँ तक कि भगवान ब्रह्मा, जिन्होंने ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति की रचना की, वह भी भगवान के एक और वैभव हैं। भौतिक सृष्टि भगवान द्वारा सक्रिय है, और इसलिए भगवान भौतिक सृष्टि का एक हिस्सा नहीं हैं। भगवान अपनी मूल, आध्यात्मिक स्थिति में विद्यमान हैं। भगवान का सार्वभौमिक रूप, वैराज-मूर्ति, भगवान का एक और गुण है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)