इमे वयं यत्प्रिययैव तन्वा
सत्त्वेन सृष्टा बहिरन्तरावि: ।
गतिं न सूक्ष्मामृषयश्च विद्महे
कुतोऽसुराद्या इतरप्रधाना: ॥ ३१ ॥
अनुवाद
चूंकि हमारे शरीर सत्व गुण से बने हैं, इसलिए हम देवता भीतर और बाहर सत्व गुण में स्थित हैं। सारे संत भी इसी प्रकार स्थित हैं। इसलिए यदि हम स्वयं भगवान को नहीं समझ सकते, तो उन लोगों के बारे में क्या कहा जाए जो तमोगुण और रजोगुण में स्थित हैं? वे भगवान को कैसे समझ सकते हैं? हम उनके चरणों में अपना सिर नवाते हैं।
Since our bodies are made up of the mode of goodness, we the demigods are situated in the mode of goodness from within and without. All saintly persons are also situated in the same way. Therefore, if we cannot understand the Supreme Lord, what can be said about those insignificant beings who are situated in the modes of passion and ignorance? How can they understand the Supreme Lord? We offer our respectful obeisances unto that Supreme Lord.
तात्पर्य
नास्तिक और राक्षस भगवान के परम व्यक्तित्व को समझ नहीं सकते हैं, हालाँकि वह हर किसी के अंदर विराजमान है। भगवद्-गीता में पुष्टि की गई है (मृत्युः सर्व-हरश्चाऽहम्) के अनुसार, आखिरकार भगवान मृत्यु के रूप में उनके सामने आते हैं। नास्तिक सोचते हैं कि वे स्वतंत्र हैं, और इसलिए वे भगवान की सर्वोच्चता की परवाह नहीं करते हैं, फिर भी भगवान अपनी सर्वोच्चता पर जोर देते हैं जब वह मृत्यु के रूप में उन पर विजय प्राप्त करते हैं। मृत्यु के समय, भगवान की सर्वोच्चता को नकारने के लिए अपने तथाकथित वैज्ञानिक ज्ञान और दार्शनिक अटकलों का उपयोग करने का उनका प्रयास काम नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए, हिरण्यकशिपु नास्तिक पुरुषों की श्रेणी का एक उत्कृष्ट प्रतिनिधि था। वह हमेशा ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देता था, और इस तरह वह अपने ही बेटे के प्रति भी शत्रुतापूर्ण हो गया था। हिरण्यकशिपु के नास्तिक सिद्धांत से हर कोई डरता था। फिर भी, जब भगवान नृसिंहादेव उसे मारने के लिए प्रकट हुए, हिरण्यकशिपु के नास्तिक सिद्धांत उसे नहीं बचा सके। भगवान नृसिंहादेव ने हिरण्यकशिपु को मार डाला और उसकी सारी शक्ति, प्रभाव और गर्व को छीन लिया। हालाँकि, नास्तिक पुरुष कभी नहीं समझ पाते कि वे जो कुछ भी बनाते हैं वह कैसे नष्ट हो जाता है। परमात्मा उनमें विराजमान है, लेकिन जुनून और अज्ञान के तरीकों की प्रधानता के कारण, वे भगवान की सर्वोच्चता को समझ नहीं सकते। यहाँ तक कि देवता, भक्त, जो पारलौकिक रूप से स्थित हैं या अच्छाई के मंच पर स्थित हैं, भगवान के गुणों और स्थिति से पूरी तरह अवगत नहीं हैं। फिर राक्षस और नास्तिक भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को कैसे समझ सकते हैं? यह संभव नहीं है। इसलिए, इस समझ को प्राप्त करने के लिए, भगवान ब्रह्मा के नेतृत्व में सभी देवताओं ने भगवान को अपनी सम्मानजनक वंदना अर्पित की।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥