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श्लोक 8.5.30  |
न यस्य कश्चातितितर्ति मायां
यया जनो मुह्यति वेद नार्थम् ।
तं निर्जितात्मात्मगुणं परेशं
नमाम भूतेषु समं चरन्तम् ॥ ३० ॥ |
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| अनुवाद |
| कोई भी भगवान् की माया से परे नहीं जा सकता है, जो इतनी प्रबल है कि हर व्यक्ति इससे भ्रमित होकर जीवन का लक्ष्य समझने की अपनी बुद्धि खो देता है। लेकिन वही माया उन भगवान् के वश में रहती है, जो सब पर शासन करते हैं और सभी जीवों के प्रति समान दृष्टिकोण रखते हैं। हम उन्हें नमस्कार करते हैं। |
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| कोई भी भगवान् की माया से परे नहीं जा सकता है, जो इतनी प्रबल है कि हर व्यक्ति इससे भ्रमित होकर जीवन का लक्ष्य समझने की अपनी बुद्धि खो देता है। लेकिन वही माया उन भगवान् के वश में रहती है, जो सब पर शासन करते हैं और सभी जीवों के प्रति समान दृष्टिकोण रखते हैं। हम उन्हें नमस्कार करते हैं। |
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