श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 5: देवताओं द्वारा भगवान् से सुरक्षा याचना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  8.5.27 
विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना-
मर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् ।
छायातपौ यत्र न गृध्रपक्षौ
तमक्षरं खं त्रियुगं व्रजामहे ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान जी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से जानते रहते हैं कि किस प्रकार प्राण, मन तथा बुद्धि समेत प्रत्येक वस्तु उनके नियंत्रण में कार्य करती है। वे हर वस्तु के प्रकाशक हैं और अज्ञान उन्हें छू तक नहीं गया। उनका भौतिक शरीर नहीं होता जो पूर्वकर्मों के फलों से प्रभावित हो। वे पक्षपात तथा भौतिकतावादी विद्या के अज्ञान से मुक्त हैं। अतएव मैं उन भगवान जी के चरणकमलों की शरण लेता हूँ जो नित्य, सर्वव्यापक तथा आकाश के समान विशाल हैं और तीनों युगों (सत्य, त्रेता तथा द्वापर) में अपने षड्ऐश्वर्यों समेत प्रकट होते हैं।
 
The Lord knows directly and indirectly how everything, including the life, mind and intelligence, functions under His control. He is the illuminator of everything and ignorance has not touched Him. He does not have a material body that is affected by the results of past activities. He is free from partiality and the ignorance of materialistic knowledge. Therefore, I take refuge in the lotus feet of the Lord who is eternal, omnipresent and vast like the sky and who appears with His six opulences in all the three ages (Satya, Treta and Dvapara).
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम् की शुरुआत में सर्वोच व्यक्तित्व, परमेश्वर को इस तरह वर्णित किया गया है: जन्माद्य अस्य यतो ’न्वयाद इतरतश् चार्तेस्वभिज्ञः। भगवान ही सभी उत्सर्जनों की उत्पत्ति हैं और वे अपनी सृष्टि के सभी क्रियाकलापों के बारे में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सब कुछ जानते हैं। इसलिए भगवान को यहाँ विपश्चितम्, जो सभी ज्ञान से पूर्ण हैं या जो सब कुछ जानते हैं, के रूप में संबोधित किया गया है। भगवान सर्वोच्च आत्मा हैं, और वे जीवित प्राणियों और उनकी इंद्रियों के बारे में सब कुछ जानते हैं।

इस श्लोक में "हमेशा जागते और अज्ञान से मुक्त" के अर्थ वाले अनीद्र शब्द का बहुत महत्व है। जैसा कि भगवद-गीता (15.15) में कहा गया है, मत्तः स्मृतिर् ज्ञानमपोहनं च: यह भगवान ही हैं जो प्रत्येक को बुद्धि देते हैं और सभी को भूलने का कारण बनते हैं। लाखों-करोड़ों जीवित प्राणी हैं, और भगवान उन्हें निर्देश देते हैं। इसलिए उनके पास सोने का समय नहीं है, और वे कभी भी हमारी गतिविधियों के बारे में नहीं जानते। भगवान हर चीज के साक्षी हैं; वह हर पल देखते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। भगवान कर्म से उत्पन्न शरीर से आच्छादित नहीं हैं। हमारे शरीर हमारे पिछले कर्मों (कर्मण दैव-नेत्रेण) के परिणामस्वरूप बनते हैं, लेकिन सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमेश्वर का कोई भौतिक शरीर नहीं है, और इसलिए उनमें कोई अविद्या, अज्ञानता नहीं है। वह सोते नहीं हैं, लेकिन हमेशा सतर्क और जाग्रत रहते हैं।

सर्वोच्च भगवान को त्रि-युग के रूप में वर्णित किया गया है क्योंकि यद्यपि वे सत्य-युग, त्रेता-युग और द्वापर-युग में विभिन्न रूप से प्रकट हुए थे, जब वे कलियुग में प्रकट हुए थे तब उन्होंने कभी खुद को सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमेश्वर घोषित नहीं किया।

कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं

संगोपांगास्त्र-पार्षदम्

भगवान कलियुग में एक भक्त के रूप में प्रकट होते हैं। इस प्रकार यद्यपि वह कृष्ण हैं, वह एक भक्त की तरह ही हरि कृष्ण मंत्र का जाप करते हैं। फिर भी, श्रीमद्-भागवतम (11.5.32) सिफारिश करता है:

यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर्यजंति हि सुमेधसः

श्री चैतन्य महाप्रभु, जिनकी रंगत कृष्ण की तरह काली नहीं बल्कि सुनहरी है (त्विषाकृष्णम्), सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमेश्वर हैं। उनके साथ नित्यानंद, अद्वैत, गदाधर और श्रीवास जैसे सहयोगी हैं। जो पर्याप्त बुद्धिमान हैं, वे संकीर्तन-यज्ञ का प्रदर्शन करके सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमेश्वर की पूजा करते हैं। इस अवतार में, सर्वोच्च भगवान खुद को सर्वोच्च भगवान नहीं घोषित करते हैं, और इसलिए उन्हें त्रि-युग के रूप में जाना जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)