इस श्लोक में "हमेशा जागते और अज्ञान से मुक्त" के अर्थ वाले अनीद्र शब्द का बहुत महत्व है। जैसा कि भगवद-गीता (15.15) में कहा गया है, मत्तः स्मृतिर् ज्ञानमपोहनं च: यह भगवान ही हैं जो प्रत्येक को बुद्धि देते हैं और सभी को भूलने का कारण बनते हैं। लाखों-करोड़ों जीवित प्राणी हैं, और भगवान उन्हें निर्देश देते हैं। इसलिए उनके पास सोने का समय नहीं है, और वे कभी भी हमारी गतिविधियों के बारे में नहीं जानते। भगवान हर चीज के साक्षी हैं; वह हर पल देखते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। भगवान कर्म से उत्पन्न शरीर से आच्छादित नहीं हैं। हमारे शरीर हमारे पिछले कर्मों (कर्मण दैव-नेत्रेण) के परिणामस्वरूप बनते हैं, लेकिन सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमेश्वर का कोई भौतिक शरीर नहीं है, और इसलिए उनमें कोई अविद्या, अज्ञानता नहीं है। वह सोते नहीं हैं, लेकिन हमेशा सतर्क और जाग्रत रहते हैं।
सर्वोच्च भगवान को त्रि-युग के रूप में वर्णित किया गया है क्योंकि यद्यपि वे सत्य-युग, त्रेता-युग और द्वापर-युग में विभिन्न रूप से प्रकट हुए थे, जब वे कलियुग में प्रकट हुए थे तब उन्होंने कभी खुद को सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमेश्वर घोषित नहीं किया।
कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं
संगोपांगास्त्र-पार्षदम्
भगवान कलियुग में एक भक्त के रूप में प्रकट होते हैं। इस प्रकार यद्यपि वह कृष्ण हैं, वह एक भक्त की तरह ही हरि कृष्ण मंत्र का जाप करते हैं। फिर भी, श्रीमद्-भागवतम (11.5.32) सिफारिश करता है:
यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर्यजंति हि सुमेधसः
श्री चैतन्य महाप्रभु, जिनकी रंगत कृष्ण की तरह काली नहीं बल्कि सुनहरी है (त्विषाकृष्णम्), सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमेश्वर हैं। उनके साथ नित्यानंद, अद्वैत, गदाधर और श्रीवास जैसे सहयोगी हैं। जो पर्याप्त बुद्धिमान हैं, वे संकीर्तन-यज्ञ का प्रदर्शन करके सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमेश्वर की पूजा करते हैं। इस अवतार में, सर्वोच्च भगवान खुद को सर्वोच्च भगवान नहीं घोषित करते हैं, और इसलिए उन्हें त्रि-युग के रूप में जाना जाता है।
