तत्रादृष्टस्वरूपाय श्रुतपूर्वाय वै प्रभु: ।
स्तुतिमब्रूत दैवीभिर्गीर्भिस्त्ववहितेन्द्रिय: ॥ २५ ॥
अनुवाद
श्वेतद्वीप में, ब्रह्माजी ने भगवान की स्तुति की। यद्यपि उन्होंने परमेश्वर को पहले कभी नहीं देखा था, तथापि उन्होंने वैदिक साहित्य से भगवान के विषय में सुना था। इसलिए उन्होंने स्थिरचित्त होकर वैदिक साहित्य में वर्णित स्तुति उसी प्रकार चढ़ाई जैसी वैदिक साहित्य में लिखी या मान्य है।
There (in Svetadvipa) Brahmaji praised the Lord, although he had never seen the Supreme Lord before. Since he had heard about the Lord from the Vedic literature, he praised the Lord with a steady mind in the same manner as is written or accepted in the Vedic literature.
तात्पर्य
ऐसा कहा जाता है कि जब ब्रह्मा और अन्य देवगण श्री स्वेतद्वीप में परम पुरुषोत्तम भगवान को देखने जाते हैं, तो वे उन्हें प्रत्यक्ष नहीं देख सकते हैं, परन्तु उनकी प्रार्थना भगवान द्वारा सुनी जाती है, और आवश्यक कार्यवाही की जाती है। हमने कई उदाहरणों में यह देखा है। 'श्रुत-पूर्वे' शब्द सार्थक है। हमें प्रत्यक्ष देखने या सुनने से अनुभव प्राप्त होता है। यदि किसी को सीधे देखना संभव न हो, तो हम उसके बारे में यथार्थ स्रोतों से सुन सकते हैं। कभी-कभी लोग पूछते हैं कि क्या हम उन्हें भगवान दिखा सकते हैं। यह हास्यास्पद है। भगवान को स्वीकार करने से पहले किसी के लिए भगवान को देखना आवश्यक नहीं है। हमारी संवेदी धारणा हमेशा अधूरी होती है। इसलिए, भले ही हम भगवान को देख लें, लेकिन हम उन्हें समझ नहीं पाएंगे। जब कृष्ण पृथ्वी पर थे, तो बहुत से लोग उन्हें देखते थे, लेकिन यह समझ नहीं पाते थे कि वे परम पुरुषोत्तम भगवान हैं। उपलब्ध्याति माँ मुधा मानुषीं तनुमाश्रितम। यद्यपि नीच और मूर्खों ने कृष्ण को व्यक्तिगत रूप से देखा, लेकिन वे यह नहीं समझ सके कि वे परम पुरुषोत्तम भगवान हैं। यहाँ तक कि भगवान को व्यक्तिगत रूप से देखने पर भी, जो भाग्यहीन होता है वह उन्हें समझ नहीं पाता है। इसलिए हमें भगवान, कृष्ण के बारे में प्रामाणिक वैदिक साहित्य और उन लोगों से सुनना चाहिए जो वैदिक संस्करण को सही ढंग से समझते हैं। यद्यपि ब्रह्मा ने पहले कभी परम पुरुषोत्तम भगवान को नहीं देखा था, लेकिन उन्हें विश्वास था कि भगवान स्वेतद्वीप में थे। इस प्रकार, उन्होंने वहाँ जाने और भगवान को प्रार्थना करने का अवसर लिया। ये प्रार्थनाएँ सामान्य मनगढंत प्रार्थनाएँ नहीं थीं। प्रार्थनाएँ वैदिक साहित्य द्वारा स्वीकृत होनी चाहिए, जैसा कि इस श्लोक में 'दैवीभिर्गिर्भिः' शब्दों से संकेत मिलता है। हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन में हम किसी भी ऐसे गीत की अनुमति नहीं देते हैं जिसे वास्तविक भक्तों द्वारा स्वीकृत या गाया न गया हो। हम मंदिर में सिनेमा गाने गाने की अनुमति नहीं दे सकते। हम आम तौर पर दो गीत गाते हैं। एक है श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्री-अद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौर-भक्त-वृंद। यह वास्तविक है। इसका हमेशा चैतन्य-चरितामृत में उल्लेख किया गया है, और इसे आचार्यों द्वारा स्वीकार किया गया है। दूसरा, निश्चित रूप से, महा-मंत्र है - हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। हम नरोत्तम दास ठाकुर, भक्तिविनोद ठाकुर और लोचन दास ठाकुर के गीत भी गा सकते हैं, लेकिन ये दो गीत - "श्री-कृष्ण-चैतन्य" और हरे कृष्ण महा-मंत्र - परम पुरुषोत्तम भगवान को प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त हैं, हालाँकि हम उन्हें नहीं देख सकते . प्रभु को देखना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि प्रामाणिक साहित्य या अधिकृत व्यक्तियों के प्रामाणिक कथनों से उनकी सराहना करना।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥