समोहं सर्वभूतेषु
न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः
ये भजन्ति तु माँ भक्त्या
मायि ते तेषु चाप्यहम्
"मैं किसी से ईर्ष्या नहीं करता, न ही मैं किसी के प्रति पक्षपाती हूँ। मैं सबके लिए समान हूँ। लेकिन जो कोई भी भक्ति में मेरी सेवा करता है वह मेरा मित्र है, मुझमें है, और मैं भी उसका मित्र हूँ।" यद्यपि भगवान निष्पक्ष हैं, लेकिन वह अपने भक्तों पर विशेष ध्यान देते हैं। इसलिए भगवान भगवद्-गीता (4.8) में कहते हैं:
परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय
संभवामि युगे युगे
"पवित्र लोगों को बचाने और दुष्टों का नाश करने के लिए, साथ ही धर्म के सिद्धांतों को फिर से स्थापित करने के लिए, मैं स्वयं सहस्राब्दियों के बाद प्रकट होता हूँ।" भगवान का किसी के संरक्षण या विनाश से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन इस भौतिक दुनिया के निर्माण, रखरखाव और विनाश के लिए उन्हें स्पष्ट रूप से अच्छाई, जुनून या अंधकार में कार्य करना होता है। वास्तव में, हालांकि, वह भौतिक प्रकृति के इन तरीकों से अप्रभावित हैं। वह सबका सर्वोच्च भगवान है। जैसे कभी-कभी राजा कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए किसी को दंडित या पुरस्कृत करता है, उसी प्रकार भगवान, यद्यपि इस भौतिक दुनिया की गतिविधियों से उनका कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी वे कभी-कभी समय, स्थान और वस्तु के अनुसार विभिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं।
