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bhagavat 8.4.9: जब इन्द्रद्युम्न महाराज परमानंद में तल्लीन होकर भगवान् की आराधना में संलग्न थे, तो अगस्त्य मुनि अपने शिष्यों के घेरे में वहाँ पधारे। जब मुनि ने देखा कि राजा इन्द्रद्युम्न एक एकांत स्थान पर बैठकर खामोश हैं और उनके स्वागत में शिष्टाचार का पालन नहीं कर रहे हैं, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए।   |   bhagavat अध्याय 8.4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन   ।   bhagavat स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  8.4.9 
यद‍ृच्छया तत्र महायशा मुनि:
समागमच्छिष्यगणै: परिश्रित: ।
तं वीक्ष्य तूष्णीमकृतार्हणादिकं
रहस्युपासीनमृषिश्चुकोप ह ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
जब इन्द्रद्युम्न महाराज परमानंद में तल्लीन होकर भगवान् की आराधना में संलग्न थे, तो अगस्त्य मुनि अपने शिष्यों के घेरे में वहाँ पधारे। जब मुनि ने देखा कि राजा इन्द्रद्युम्न एक एकांत स्थान पर बैठकर खामोश हैं और उनके स्वागत में शिष्टाचार का पालन नहीं कर रहे हैं, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए।
 
When King Indradyumna was engrossed in meditation while worshipping the Lord, sage Agastya arrived there with his disciples. When the sage saw that King Indradyumna was sitting in a secluded place and observing silence and was not following the etiquette of welcoming him, he became very angry.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)