श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  8.4.6 
गजेन्द्रो भगवत्स्पर्शाद् विमुक्तोऽज्ञानबन्धनात् ।
प्राप्तो भगवतो रूपं पीतवासाश्चतुर्भुज: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि गजेन्द्र, हाथियों के राजा, को सीधे भगवान के करकमलों ने स्पर्श किया था, इसलिए वह तुरंत सभी भौतिक अज्ञानता और बंधन से मुक्त हो गया। इस प्रकार उसे सारूप्य-मुक्ति प्राप्त हुई, जिसमें उसे भगवान के समान शारीरिक विशेषताएँ प्राप्त हुईं, वह पीले वस्त्र पहने हुए था और उसके चार हाथ थे।
 
Since Gajendra was directly touched by the Lord with His lotus hands, he was instantly liberated from all material ignorance and bondage. Thus he attained sarupya-mukti in which he got the same physical form as the Lord. He became four-armed and wore yellow clothes.
तात्पर्य
यदि किसी को सर्वोच्च भगवान् का अनुग्रह प्राप्त होता है, और भगवान उसकी स्थूल देह को छू लेते हैं, तो उसका शरीर आध्यात्मिक शरीर में परिवर्तित हो जाता है और वह वापस घर, वापस भगवान के पास जा सकता है। जब भगवान ने उसके शरीर को छुआ तो गजेंद्र ने एक आध्यात्मिक शरीर धारण किया। इसी प्रकार, ध्रुव महाराज ने इसी प्रकार अपने आध्यात्मिक शरीर को प्राप्त किया। अर्चना-पद्धति, देवता की दैनिक पूजा, सर्वोच्च भगवान की देह को छूने का अवसर प्रदान करती है और इस प्रकार यह किसी को एक आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करने और भगवान के पास वापस जाने के लिए पर्याप्त भाग्यशाली बनाने में सक्षम बनाती है। केवल सर्वोच्च भगवान की देह को छूने से ही नहीं, बल्कि बस उनके लीलाओं के बारे में सुनने से, उनकी महिमा का जाप करने से, उनके चरणों को छूने से और पूजा अर्पित करने से - दूसरे शब्दों में, भगवान की किसी न किसी प्रकार से सेवा करने से - भौतिक संदूषण से शुद्ध हो जाता है। यह सर्वोच्च भगवान को स्पर्श करने का परिणाम है। जो एक शुद्ध भक्त (अन्याभिलाषिता-शून्यम) है, जो शास्त्र और सर्वोच्च भगवान के वचनों के अनुसार कार्य करता है, निश्चित रूप से शुद्ध हो जाता है। गजेंद्र की तरह, वह एक आध्यात्मिक शरीर धारण करता है और घर वापस, भगवान के पास लौट जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)