श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  8.4.1 
श्रीशुक उवाच
तदा देवर्षिगन्धर्वा ब्रह्मेशानपुरोगमा: ।
मुमुचु: कुसुमासारं शंसन्त: कर्म तद्धरे: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा: जब भगवान् ने हाथियों के राजा गजेन्द्र का उद्धार किया तो ब्रह्मा और शिव के नेतृत्व में सभी ऋषियों, गन्धर्वों और देवताओं ने भगवान् के इस कार्य की प्रशंसा की और भगवान् तथा गजेन्द्र दोनों के ऊपर फूलों की वर्षा की।
 
Śrī Sukadeva Gosvāmī said: When the Lord saved Gajendra, all the sages, Gandharvas and demigods such as Brahmā, Śiva, etc. praised the Lord's action and showered flowers on both the Lord and Gajendra.
तात्पर्य
इस अध्याय से यह स्पष्ट है कि देवल ऋषि, नारद मुनि और अगस्त्य मुनि जैसे महान संत कभी-कभी किसी को श्राप देते हैं। हालाँकि, ऐसे व्यक्तित्व का श्राप वास्तव में एक वरदान है। मगरमच्छ, जो अपने पिछले जन्म में एक गंधर्व था, और गजेंद्र, जो इंद्रद्युम्न नामक राजा थे, दोनों को शाप दिया गया था, लेकिन दोनों को लाभ हुआ। इंद्रद्युम्न, एक हाथी के रूप में अपने जन्म में, मोक्ष प्राप्त किया और वैकुण्ठ में भगवान के व्यक्तिगत सहयोगी बन गए, और मगरमच्छ ने एक गंधर्व के रूप में अपनी स्थिति फिर से हासिल कर ली। हम कई जगहों पर प्रमाण पाते हैं कि एक महान संत या भक्त का श्राप श्राप नहीं बल्कि एक वरदान है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)