श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  8.3.20-21 
एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं
वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्ना: ।
अत्यद्भ‍ुतं तच्चरितं सुमङ्गलं
गायन्त आनन्दसमुद्रमग्ना: ॥ २० ॥
तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान की सेवा के अलावा और कोई चाह न रखने वाले ऐसे अनन्य भक्त, पूर्ण समर्पण के साथ उनकी पूजा करते हैं और उनके आश्चर्यजनक और शुभ कार्यों के बारे में हमेशा सुनते और जपते हैं। इस तरह वे हमेशा पारलौकिक आनंद के सागर में विलीन रहते हैं। ऐसे भक्त भगवान से कोई वरदान नहीं मांगते, लेकिन मैं संकट में हूं। इसलिए मैं उस परमेश्वर भगवान की स्तुति करता हूं, जो शाश्वत रूप से विद्यमान हैं, जो अदृश्य हैं, जो ब्रह्मा जैसे महान व्यक्तियों के भी स्वामी हैं और जो केवल दिव्य भक्ति-योग द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं। अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण, वे मेरी इंद्रियों की पहुंच से और सभी बाहरी अनुभूति से परे हैं। वे असीम हैं, वे मूल कारण हैं, और वे हर तरह से पूर्ण हैं। मैं उन्हें प्रणाम करता हूं।
 
Such exclusive devotees, who have no other desire than to serve the Lord, worship Him in total surrender and always hear and sing about His wonderful and auspicious activities. Thus they are always immersed in the ocean of transcendental bliss. Such devotees do not ask for any benedictions from the Lord, but I am in trouble. Therefore I offer my prayers to the Lord who is eternally existing, who is invisible, who is the master of even great souls like Brahmā and who is attainable only by transcendental devotional service. Being extremely subtle, He is beyond the reach of my senses and all external perception. He is infinite, He is the primal cause and He is perfect in every respect. I offer my obeisances unto Him.
तात्पर्य
अन्‍याभिलाषित‍ा-शून्यं ज्ञान-कर्मद‍्य-अनावृतम् ।

आनु‍कूल्‍येन कृष्‍णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ।।

(भक्ति-रसामृत-सिंधु १.१.११)

"इस प्रकार परम भगवान श्रीकृष्‍ण को भौतिक हित अथवा फल-प्रद कार्यों अथवा दार्शनिक अटकलों की इच्‍छा रहित, अनुकूलतापूर्वक प्रेममय सेवा करनी चाहिये। यही उत्तम भक्ति कहलाती है।" विशुद्ध भक्‍तों को भगवान से माँगने के लिये कुछ भी नहीं होता, किंतु हाथियों के राजा गजेंद्र, परिस्थितिवश तत्‍काल वर माँग रहे थे क्‍योंकि उनके बचाव का कोई और मार्ग न था। कभी-कभी जब कोई व्‍यवहारिक उपाय नहीं होता तो विशुद्ध भक्‍त, जो सदा भगवान की दया पर निर्भर रहते हैं, कुछ वर के लिये प्रार्थना करते हैं। लेकिन इस प्रकार की प्रार्थना में भी पश्‍‍चाताप का भाव रहता है। जो हमेशा भगवान के दिव्‍य चरित्र-लीलाओं का श्रवण और कीर्तन करते हैं, वे सदैव ऐसी श्रेणी में स्थित रहते हैं जहाँ भौतिक लाभ की दृष्टि से उनके लिये कुछ भी माँगने जैसा नहीं रहता। जब तक मनुष्‍य विशुद्ध भक्‍त नहीं बन जाता तब तक वह संकीर्तन आंदोलन के उन्‍माद में कीर्तन और नृत्‍य से उत्‍पन्‍न होने वाले दिव्‍य आनन्‍द का आनंद नहीं ले सकता। इस प्रकार का उन्‍माद एक साधारण भक्‍त के लिये संभव नहीं होता। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने हमे यह दिखाया कि केवल कीर्तन, श्रवण और नृत्‍य करने के उन्‍माद में ही मनुष्‍य दिव्‍य आनंद का अनुभव कर सकता है। यही भक्ति-योग है। इसलिये हाथियों के राजा, गजेंद्र ने कहा, अध्‍यात्मिक-योग-गम्‍यम्, जिसका आशय है कि जब तक मनुष्‍य इस आध्‍यात्मिक श्रेणी में नहीं पहुँच जायेगा तब तक वह भगवान से समीप नहीं पहुँच सकता। भगवान के समीप पहुँचने का यह वर मनुष्‍य को असंख्‍य जन्‍मों के बाद मिलता है, फिर भी श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह वर सबको, यहाँ तक कि उन पतित आत्‍माओं को भी दिया है जिनका अध्‍यात्मिक जीवन में कोई वंश न हो। यह हम कृष्‍णभावनामृत आंदोलन में वास्‍तव में देख रहे हैं। इसलिये भक्ति-योग ही वह निर्दोष पद्धति है जिसके द्वारा मनुष्‍य भगवान तक पहुँच सकता है। भक्‍त्‍याहम एकया ग्राह्‍य: - केवल भक्ति सेवा द्वारा ही मनुष्‍य भगवान तक पहुँच सकता है। भगवान कहते हैं :-

मा‍य्‍य आसक्‍त-मना: पार्थ

योगं युंजन मदाश्रय: ।

असंशयं समग्रं मा

यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।।

"हे पृथा के पुत्र अर्जुन, अब तुम सुनो कि कैसे मुझमें पूर्ण रुप से मन लगाये रहने के कारण मेरे आश्रय में रहते हुए योग का अभ्‍यास करके, तुम मुझे पूर्ण रुप से, संदेह रहित, जान सकोगे।" केवल कृष्‍णभावनामृत में लीन रहने, और कृष्‍ण के चरण-कमलों का निरंतर चिन्तन करके ही मनुष्‍य भगवान को संदेह रहित पूर्ण रुप से समझ सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)