श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  8.3.14 
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नम: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! आप सभी इंद्रियों के विषयों के साक्षी हैं। आपकी कृपा के बिना, संदेहों की समस्या का हल करना असंभव है। यह भौतिक जगत आपके अनुरूप छाया के समान है। निस्संदेह, मनुष्य इस भौतिक जगत को वास्तविक मानता है क्योंकि इससे आपके अस्तित्व की झलक मिलती है।
 
O Lord! You are the observer of all sense-objects. Without Your grace there is no possibility of the problem of doubts being solved. This material world is like a shadow of Your image. Undoubtedly, man accepts this material world as the truth because it gives a glimpse of Your existence.
तात्पर्य
इस पद का भावार्थ इस प्रकार है :"काम-कार्यों के परिणामों को वास्तव में आप ही साक्षात् करवाते हैं | आपके निर्देश के बिना प्राणी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता | जैसा कि भगवदगीता (15.15) में कहा गया है sarvasya caham hrdi sannivisto mattah smrti jnanam apohanam ca | आप सबके हृदय में स्थित हैं, स्मरण और विस्मरण आपसे ही प्राप्त होता है | Chayeva yasya bhuvanani bibharti durga | माया के चंगुल में फँसा हुआ प्राणी भौतिक जगत का भोग करना चाहता है पर बिना आपके निर्देश और स्मरण कराए वह जीवन के अपने छायामय उद्देश्य में प्रगति नहीं कर सकता | बद्ध आत्मा जीवन दर जीवन, सही उद्देश्य की जगह गलत उद्देश्य में बढ़ता जाता है और आप ही उसे उसके उस उद्देश्य की याद दिलाते हैं | एक जीवन में बद्ध आत्मा एक खास उद्देश्य में आगे बढ़ने की इच्छा रखता है पर देह बदलने पर वह सब भूल जाता है | फिर भी, मेरे प्रभु, क्योंकि वह इस भौतिक जगत का कुछ भोगना चाहता है, आप उसे उसके अगले जन्म में उसकी याद दिलाते हैं | Mattaḥ smrti jnanam apohanam ca | क्योंकि बद्ध आत्मा आपको भूलना चाहता है, आप अपनी कृपा से उसे जीवन दर जीवन इस तरह के अवसर देते हैं जिससे वह हमेशा के लिए आपको भूल जाए | इसलिए आप सदा बद्ध आत्माओं के निर्देशक रहते हैं | आप ही सबके मूल कारण हैं इसीलिए सब कुछ वास्तविक दिखाई देता है | परम सत्य आप ही हैं, जो भगवान है | मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ |"

Sarva-pratyaya-hetave शब्द की व्याख्या श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर करते हैं, जो कहते हैं कि किसी फल को देखकर उसके कारण का पता लग जाता है | उदाहरण के लिए मिट्टी का घड़ा कुम्हार के कार्य का फल है इसलिए घड़े को देखकर कुम्हार के होने का अनुमान लगा सकते हैं | इसी प्रकार, यह भौतिक जगत आध्यात्मिक जगत जैसा दिखाई देता है, और कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति अनुमान लगा सकता है कि यह कैसे कार्य करता है | जैसा कि भगवदगीता में कहा गया है, mayadhyaksena prakritih suyate sa-caracaram | भौतिक जगत के कार्य बताते हैं कि उसके पीछे भगवान का निर्देशन है |

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)