यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम्
"हे भरत के वंशज, जब भी और जहाँ भी धार्मिक व्यवहार में गिरावट, और अधर्म का प्रमुख उदय होता है - उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।" भौतिक दुनिया में हमेशा कृष्ण चेतना से भटकने की संभावना रहती है, और इसलिए कृष्ण और उनके भक्त हमेशा ऐसी अधर्मियों को रोकने के लिए विभिन्न रूपों में कार्य करते हैं। यहां तक कि निजीवादी जो कि भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के ज्ञान विषेषता पर जोर देते हैं, वे भगवान के तेज में विलय होना चाहते हैं। इसलिए, यहाँ शब्द ज्ञान-घनया यह बताता है कि नास्तिकों के लिए जो प्रभु के रूप और अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं, ये सभी विभिन्न अवतार प्रकट होते हैं। चूँकि प्रभु इतने सारे रूपों में सिखाने आते हैं, इसलिए कोई भी यह नहीं कह सकता कि कोई भगवान नहीं है। शब्द ज्ञान-घनया का उपयोग विशेष रूप से उन लोगों को इंगित करने के लिए किया जाता है जिनका ज्ञान दार्शनिक समझ की तलाश के कारण मजबूत हो गया है। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझने के लिए सतही ज्ञान बेकार है, लेकिन जब किसी का ज्ञान अत्यधिक तीव्र और गहरा हो जाता है, तो वह वासुदेव को समझता है (वासुदेवः सर्वम इति स महात्मा सुदुर्लभः) । एक जानी कई जन्मों के बाद इस स्तर पर पहुँचता है। इसलिए यहाँ शब्द ज्ञान- घनाया का उपयोग किया गया है। शब्द शांताय इंगित करता है कि भगवान वासुदेव सभी के दिल में स्थित हैं, लेकिन सजीव इकाई के साथ कार्य नहीं करते हैं। निजीवादी ज्ञानी वासुदेव को तब प्राप्त करते हैं जब वे पूरी तरह से ज्ञान में परिपक्व हो जाते हैं (वासुदेवः सर्वम इति स महात्मा सुदुर्लभः) ।
