श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  8.3.12 
नम: शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
मैं सर्वव्यापी भगवान वासुदेव को, भगवान के भयानक स्वरूप नृसिंहदेव के प्रति, भगवान के पशुरूप वराहदेव को, निर्गुणता का उपदेश देने वाले भगवान दत्तात्रेय को, भगवान बुद्ध को और अन्य सभी अवतारों के प्रति श्रद्धा प्रकट करता हूँ। मैं उन भगवान को सादर प्रणाम करता हूँ जो निर्गुण हैं किन्तु संसार में सत्व, रज और तम गुणों को स्वीकार करते हैं। मैं निर्गुण ब्रह्मतेज को भी सादर प्रणाम करता हूँ।
 
I offer my obeisances unto the omnipresent Lord Vasudeva, the fearful form of the Lord, the animal form of the Lord (Varaha Deva), the Lord Dattatreya who preaches impersonalism, the Lord Buddha and all other incarnations. I offer my obeisances unto the Lord who is without attributes but accepts the modes of goodness, passion and ignorance in the material world. I also offer my obeisances unto the impersonal Brahman.
तात्पर्य
पिछले श्लोकों में यह व्याख्या की गई है कि हालांकि भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का कोई भौतिक रूप नहीं है, लेकिन वह अपने भक्तों पर उपकार करने और राक्षसों को मारने के लिए असंख्य रूपों को स्वीकार करते हैं जैसा कि श्रीमद्-भागवतम में कहा गया है, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के कई अवतार है जो नदी की लहरों की तरह हैं। नदी की लहरें निरंतर बहती हैं और कोई भी नहीं बता सकता कि कितनी लहरें हैं। इसी तरह, कोई यह नहीं बता सकता कि प्रभु के विभिन्न अवतार, समय, स्थान और पात्रों की आवश्यकता के अनुसार कब और कैसे प्रकट होते हैं। प्रभु निरंतर प्रकट होते रहते हैं। जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने भगवद-गीता (4.7) में कहा है:

यदा यदा हि धर्मस्य

ग्लानिर्भवति भारत

अभ्युत्थानमधर्मस्य

तदात्मानं सृजाम्यहम्

"हे भरत के वंशज, जब भी और जहाँ भी धार्मिक व्यवहार में गिरावट, और अधर्म का प्रमुख उदय होता है - उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।" भौतिक दुनिया में हमेशा कृष्ण चेतना से भटकने की संभावना रहती है, और इसलिए कृष्ण और उनके भक्त हमेशा ऐसी अधर्मियों को रोकने के लिए विभिन्न रूपों में कार्य करते हैं। यहां तक कि निजीवादी जो कि भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के ज्ञान विषेषता पर जोर देते हैं, वे भगवान के तेज में विलय होना चाहते हैं। इसलिए, यहाँ शब्द ज्ञान-घनया यह बताता है कि नास्तिकों के लिए जो प्रभु के रूप और अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं, ये सभी विभिन्न अवतार प्रकट होते हैं। चूँकि प्रभु इतने सारे रूपों में सिखाने आते हैं, इसलिए कोई भी यह नहीं कह सकता कि कोई भगवान नहीं है। शब्द ज्ञान-घनया का उपयोग विशेष रूप से उन लोगों को इंगित करने के लिए किया जाता है जिनका ज्ञान दार्शनिक समझ की तलाश के कारण मजबूत हो गया है। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझने के लिए सतही ज्ञान बेकार है, लेकिन जब किसी का ज्ञान अत्यधिक तीव्र और गहरा हो जाता है, तो वह वासुदेव को समझता है (वासुदेवः सर्वम इति स महात्मा सुदुर्लभः) । एक जानी कई जन्मों के बाद इस स्तर पर पहुँचता है। इसलिए यहाँ शब्द ज्ञान- घनाया का उपयोग किया गया है। शब्द शांताय इंगित करता है कि भगवान वासुदेव सभी के दिल में स्थित हैं, लेकिन सजीव इकाई के साथ कार्य नहीं करते हैं। निजीवादी ज्ञानी वासुदेव को तब प्राप्त करते हैं जब वे पूरी तरह से ज्ञान में परिपक्व हो जाते हैं (वासुदेवः सर्वम इति स महात्मा सुदुर्लभः) ।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)