श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  8.3.11 
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नम: कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
अनुभव करते हैं तत्व साधक, भक्तियोग में कर्मरत।
अकलुषित सुख के दाता वो, हर्षित करते भरत।
दिव्यलोक के स्वामी वो, निशदिन रखते धरा संभाल।
अतएव मेरा शत-शत नमन, स्तुति करूँ मैं सत्काल।
 
God is realized by those pure devotees who perform their duties in the divine state of devotion. He is the giver of unadulterated happiness and the master of the divine world. Therefore, I bow to Him.
तात्पर्य
जैसा कि भगवद गीता में कहा गया है, परमेश्वर को केवल भक्ति सेवा से ही समझा जा सकता है। भक्त्या मामभिजानाति यावान यश्चासि तत्वतः। यदि कोई परमेश्वर को सत्य रूप में जानना चाहता है, तो उसे भक्ति सेवा की गतिविधियों में प्रवेश करना चाहिए। इन गतिविधियों को सत्त्व या शुद्ध-सत्त्व कहा जाता है। भौतिक दुनिया में, अच्छाई की गतिविधियों की प्रशंसा की जाती है, जो एक शुद्ध ब्राह्मण के लक्षण हैं। लेकिन भक्ति सेवा की गतिविधियाँ शुद्ध-सत्त्व हैं; दूसरे शब्दों में, वे पारलौकिक मंच पर हैं। केवल भक्ति सेवा से ही परम को समझा जा सकता है। भक्ति सेवा को नैष्कर्म्य कहा जाता है। भौतिक गतिविधियों का मात्र निषेध नहीं चलेगा। नैष्कर्म्यम अप्य अच्युत-भाव-वर्जितम। जब तक कि कोई कृष्ण चेतना के संदर्भ में गतिविधियाँ नहीं करता है, भौतिक गतिविधियों का समाप्त नहीं होना सहायक नहीं होगा। नैष्कर्म्य प्राप्त करने की आशा में, भौतिक कार्य से मुक्ति, कई अत्यधिक ऊंचे संन्यासियों ने अपनी गतिविधियों को बंद कर दिया, फिर भी वे असफल रहे और भौतिकवादी व्यक्तियों के रूप में कार्य करने के लिए भौतिक मंच पर लौट आए। लेकिन एक बार कोई भक्ति-योग की आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न हो जाता है, तो वह नीचे नहीं गिरता है। इसलिए हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन का प्रयास सभी को हमेशा आध्यात्मिक गतिविधि में संलग्न करना है, जिसके द्वारा कोई भौतिक क्रियाओं के लिए पारलौकिक हो जाता है। भक्ति-मार्ग की आध्यात्मिक गतिविधियाँ - श्रवण कीर्तनम विष्णोः स्मरणम पाड-सेवनम - किसी को परमेश्वर को समझने के लिए प्रेरित करती हैं। इसलिए, जैसा कि यहाँ कहा गया है, सत्त्वेन प्रतिलब्धाय नैष्कर्म्येण विपश्चितः: "परमेश्वर को शुद्ध भक्तों द्वारा महसूस किया जाता है जो भक्ति-योग के पारलौकिक अस्तित्व में कार्य करते हैं।"

गोपाल-तापनी उपनिषद (15) कहती है, भक्तिर अस्य भजनं तदिहामुत्रोपाधि-नैरास्येनैवामुष्मिन मनसः कल्पनम एतद एव च नैष्कर्म्यम। यह नैष्कर्म्य की परिभाषा है। कोई नैष्कर्म्य में कार्य करता है जब वह पूरी तरह से कृष्ण चेतना संबंधी गतिविधियों में संलग्न होता है, बिना यहाँ या ऊपरी ग्रहों में, वर्तमान जीवन में या भविष्य के जीवन (इहा-अमुत्र) में भोगने की भौतिक इच्छाओं के बिना। अन्यभिलाषिता-शून्यम। जब कोई सभी दूषितों से मुक्त हो जाता है और वह आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में भक्ति सेवा में कार्य करता है, तो वह नैष्कर्म के मंच पर होता है। ऐसी पारलौकिक भक्ति सेवा से भगवान की सेवा की जाती है। मैं उन्हें अपने सम्मानजनक प्रणाम अर्पित करता हूँ।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)