गोपाल-तापनी उपनिषद (15) कहती है, भक्तिर अस्य भजनं तदिहामुत्रोपाधि-नैरास्येनैवामुष्मिन मनसः कल्पनम एतद एव च नैष्कर्म्यम। यह नैष्कर्म्य की परिभाषा है। कोई नैष्कर्म्य में कार्य करता है जब वह पूरी तरह से कृष्ण चेतना संबंधी गतिविधियों में संलग्न होता है, बिना यहाँ या ऊपरी ग्रहों में, वर्तमान जीवन में या भविष्य के जीवन (इहा-अमुत्र) में भोगने की भौतिक इच्छाओं के बिना। अन्यभिलाषिता-शून्यम। जब कोई सभी दूषितों से मुक्त हो जाता है और वह आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में भक्ति सेवा में कार्य करता है, तो वह नैष्कर्म के मंच पर होता है। ऐसी पारलौकिक भक्ति सेवा से भगवान की सेवा की जाती है। मैं उन्हें अपने सम्मानजनक प्रणाम अर्पित करता हूँ।
