श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 24: भगवान् का मत्स्यावतार  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  8.24.61 
प्रलयपयसि धातु: सुप्तशक्तेर्मुखेभ्य:
श्रुतिगणमपनीतं प्रत्युपादत्त हत्वा ।
दितिजमकथयद् यो ब्रह्म सत्यव्रतानां
तमहमखिलहेतुं जिह्ममीनं नतोऽस्मि ॥ ६१ ॥
 
 
अनुवाद
मैं उस परमेश्वर को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता हूँ जिन्होंने एक बड़ी मछली का रूप धरने का ढोंग किया और जब भगवान ब्रह्मा अपनी नींद से जागे तब उन्हें वैदिक साहित्य वापस लौटाया और राजा सत्यव्रत और महान संतों को वैदिक साहित्य का सार समझाया।
 
I offer my respectful obeisances to the Supreme Personality of Godhead, who pretended to assume the form of a giant fish that brought back the Vedic literature to Brahma when he awoke from his sleep, and who explained the essence of the Vedic literature to King Satyavrata and the great sages.
तात्पर्य
यहाँ पर सत्यव्रत के भगवान् विष्णु के मत्स्य अवतार से मिलने का सारांश दिया गया है। भगवान् विष्णु का उद्देश्य दैत्य हयग्रीव से सभी वैदिक साहित्यों को वापस लेना और उन्हें भगवान् ब्रह्मा को सौंपना था। संयोगवश, अपनी अकारण दया से, प्रभु ने सत्यव्रत से बात की। सत्यव्रतानाम शब्द का अर्थपूर्ण है क्योंकि ये इस बात का संकेत करता है कि सत्यव्रत के स्तर के लोग परम पुरुषोत्तम द्वारा कही गयी वेदों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। जो कुछ भी परम भगवान् द्वारा कहा जाता है उसे वेद माना जाता है। जैसा भागवत गीता में कहा गया है, वेदान्त-कृत वेद-विद्: परम पुरुषोत्तम सभी वैदिक ज्ञान के संकलनकर्ता हैं, और वे वेदों के मूल को जानते हैं। इसलिए, जो कोई भी परम पुरुषोत्तम कृष्ण, या जैसी है भागवत गीता से ज्ञान प्राप्त करता है, वो वेदों (वेदईश च सर्वैर अहम एवं वेद्यः) के उद्देश्य को जानता है। वेदा-वाद-रत्ताओं द्वारा, जो वेद पढ़ते हैं और उनके विषय को गलत तरीके से समझाते हैं वे वैदिक ज्ञान को समझ नहीं सकते। व्यक्ति को परम पुरुषोत्तम से वेदों के बारे में जानना होगा।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध आठ के अंतर्गत चौबीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)