श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 24: भगवान् का मत्स्यावतार  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  8.24.52 
त्वं सर्वलोकस्य सुहृत् प्रियेश्वरो
ह्यात्मा गुरुर्ज्ञानमभीष्टसिद्धि: ।
तथापि लोको न भवन्तमन्धधी-
र्जानाति सन्तं हृदि बद्धकाम: ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! आप ही सबके सच्चे शुभचिंतक और सबसे प्यारे मित्र हैं। आप ही सबके नियंत्रक हैं, परमात्मा हैं, सर्वोच्च उपदेशक हैं, परम ज्ञान के दाता हैं और सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले हैं। हालाँकि आप हृदय में ही रहते हैं, किन्तु हृदय में बसी वासनाओं के कारण मूर्ख व्यक्ति आपको समझ नहीं पाता।
 
O Lord! You are the best well-wisher and dearest friend of all, the controller, the Supreme Being, the ultimate preacher, the giver of supreme knowledge and the fulfiller of all desires. Although you reside in the heart, a foolish person cannot understand you due to the lustful desires residing in the heart.
तात्पर्य
यहाँ मूर्खता के कारण का वर्णन किया गया है। क्योंकि इस भौतिक संसार में बद्ध आत्मा सांसारिक वासनाओं से भरी हुई है, वह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को नहीं समझ सकते हैं, यद्यपि प्रभु हर किसी के हृदय में स्थित हैं (ईश्वरः सर्व-भूतानां हृद-देशे अर्जुन तिष्ठति)। इस मूर्खता के कारण ही कोई प्रभु से निर्देश नहीं ले पाता, यद्यपि प्रभु बाहरी और आंतरिक दोनों तरह से सभी को निर्देश देने के लिए तैयार रहते हैं। भगवान कहते हैं, ददामि बुद्धि-योगं तं येन मामुपयांति ते। दूसरे शब्दों में, प्रभु भक्ति सेवा के बारे में निर्देश दे सकते हैं जिससे व्यक्ति वापस घर, वापस ईश्वर के पास जा सकता है। दुर्भाग्यवश, लोग यह भक्ति सेवा नहीं लेते हैं। भगवान, हर किसी के हृदय में स्थित होकर ईश्वर के पास वापस जाने के बारे में पूर्ण निर्देश दे सकते हैं, लेकिन वासनाओं के कारण व्यक्ति स्वयं को भौतिकवादी गतिविधियों में उलझा लेता है और प्रभु की सेवा नहीं करता है। इसलिए व्यक्ति प्रभु के निर्देशों के मूल्य से वंचित रह जाता है। मानसिक कल्पना से कोई यह समझ सकता है कि वह शरीर नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक आत्मा है, लेकिन जब तक वह भक्ति सेवा में संलग्न नहीं होता, जीवन का वास्तविक उद्देश्य कभी भी पूरा नहीं होता है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य घर वापस, वापस ईश्वर के पास जाना, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के साथ रहना, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के साथ खेलना, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के साथ नृत्य करना और ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के साथ खाना है। ये आनंद के विभिन्न प्रकार हैं, आध्यात्मिक भिन्नता में आध्यात्मिक सुख। भले ही कोई ब्रह्म-भूत के स्तर पर आ सकता है। और सैद्धांतिक ज्ञान से अपनी आध्यात्मिक पहचान को समझ सकता है, लेकिन कोई भी भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझे बिना आध्यात्मिक जीवन का आनंद नहीं ले सकता है। यह यहाँ अभिष्ट-सिद्धि शब्द से संकेतित है। जीवन के अंतिम लक्ष्य को केवल प्रभु की भक्ति सेवा में संलग्न होकर ही पूरा किया जा सकता है। तब प्रभु उन्हें घर वापस, वापस ईश्वर के पास जाने का उचित निर्देश देंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)