तथाकथित भौतिकतावादी गुरु अपने भौतिकतावादी शिष्यों को आर्थिक विकास और इन्द्रियतृप्ति के बारे में सिखाता है। उसकी शिक्षाओं के चलते मूर्ख शिष्य अज्ञान के चक्र में भौतिक संसार में बने रहते हैं। दूसरी ओर, आप शाश्वत ज्ञान प्रदान करते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति जो यह ज्ञान प्राप्त करता है, वह तुरंत अपनी मूल वैधानिक स्थिति में पहुँच जाता है।
The so-called materialistic guru preaches to his materialistic disciples about economic development and sense gratification and by such preaching the foolish disciples remain trapped in the material world of ignorance. But You impart eternal knowledge and the intelligent person attains such knowledge immediately to his original constitutional position.
तात्पर्य
तथाकथित गुरु शिष्यों को उनकी निजी भलाई के लिए उपदेश देते हैं। कुछ गुरु यही सलाह देते हैं कि व्यक्ति को इस तरह से ध्यान करना चाहिए कि उसकी समझ बढ़े, ताकि वह अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने के लिए अपने शरीर को चुस्त रख सके। दूसरा गुरु यह सलाह देता है कि यौन संबंध जीवन का अंतिम लक्ष्य है और इसलिए व्यक्ति को यथासंभव यौन संबंध बनाने चाहिए। ये मूर्ख गुरुओं के निर्देश हैं। दूसरे शब्दों में, किसी मूर्ख गुरु के निर्देशों के कारण व्यक्ति निरंतर भौतिक अस्तित्व में बना रहता है और उसकी आपत्तियों और विपत्तियों से पीड़ित होता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति इतना बुद्धिमान है कि भगवान श्रीकृष्ण के परम व्यक्तित्व से निर्देश लेता है, जैसा कि भगवद गीता या कपिलदेव के सांख्य दर्शन में कहा गया है, तो वह बहुत जल्द मुक्ति पा सकता है और अपने आध्यात्मिक जीवन की मूल स्थिति में रह सकता है। निजं पदं शब्द महत्वपूर्ण हैं। भगवान श्रीकृष्ण के परम व्यक्तित्व का अभिन्न अंग होने के कारण जीव वैकुण्ठ लोक या आध्यात्मिक दुनिया में किसी पद का जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त है, जहाँ कोई चिंता नहीं है। इसलिए, व्यक्ति को भगवान श्रीकृष्ण के परम व्यक्तित्व के निर्देशों का पालन करना चाहिए। तब, जैसा कि भगवद गीता में कहा गया है, त्याक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति मां एति सो- अर्जुन: अपने शरीर को त्यागने के बाद, व्यक्ति अपने घर, वापस भगवान के पास पहुँच जाएगा। भगवान अपने मूल व्यक्तित्व में आध्यात्मिक दुनिया में रहते हैं, और एक भक्त जो भगवान के निर्देशों का पालन करता है वह उनके पास जाता है (माँ एति)। एक साधक व्यक्ति के रूप में, ऐसा भक्त भगवान श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व के पास वापस जाता है और उनके साथ खेलता है और नाचता है। यही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥