यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम्
"हे भरत के वंशज, जब कभी और जहां भी धार्मिक आचार में गिरावट आती है, और अधर्म की प्रबलता बढ़ती है - उस समय मैं स्वयं अवतार लेता हूं।" प्रभु प्रत्येक अवतार में अधार्मिक सिद्धांतों से संसार की रक्षा करने के लिए अवतरित होते हैं और खासकर अपने भक्तों की रक्षा के लिए (परित्राणाय साधूनाम्)। उदाहरण के लिए, वामनदेव भक्त बलि महाराज की रक्षा के लिए अवतरित हुए। इसी तरह, जब भगवान ने मछली का घृणित रूप धारण किया, तो निश्चित रूप से उन्होंने ऐसा किसी भक्त का उपकार करने के लिए किया होगा। परीक्षित महाराज उस भक्त के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे जिसके लिए भगवान ने यह रूप धारण किया था।
