श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 24: भगवान् का मत्स्यावतार  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  8.24.14 
तमाह सातिकरुणं महाकारुणिकं नृपम् ।
यादोभ्यो ज्ञातिघातिभ्यो दीनां मां दीनवत्सल ।
कथं विसृजसे राजन् भीतामस्मिन् सरिज्जले ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
अत्यंत अनुकंपाशील राजा सत्यव्रत से उस बेचारी छोटी मछली ने करुण स्वर में कहा: हे निर्धनों के रक्षक राजा! आप मुझे नदी के जल में क्यों फेंक रहे हैं जहाँ पर अन्य जलचर हैं और जो मुझे मार सकते हैं? मैं उनसे अत्यधिक भयभीत हूँ।
 
That poor little fish said to the very kind King Satyavrata in a pitiful voice: O king, protector of the poor! Why are you throwing me into the river water where there are other aquatic creatures who can kill me? I am very afraid of them.
तात्पर्य
मत्स्य पुराण में कहा गया है:

अनन्त-शक्तिर भगवान्

मत्स्य-रूपी जनार्दनः

क्रीडार्थम् याचयाम् आसं

स्वयं सत्यव्रतम् नृपम्

"भगवान के पास असीमित शक्ति है। फिर भी, मछली के रूप में अपने मनोरंजन के लिए उन्होंने राजा सत्यव्रत से सुरक्षा की भीख मांगी।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)