बलि महाराज ने कहा: आपको नमन करने के प्रयास में भी कितना सुखद प्रभाव है। मैंने तो केवल आपको नमन करने का प्रयास किया था, परन्तु वह प्रयास शुद्ध भक्तों के प्रयासों के समान ही सफल हुआ। आपने मुझ पतित असुर पर जो अकारण कृपा की है वह कृपा तो देवताओं या लोकपालों को भी कभी प्राप्त नहीं हुई।
Bali Maharaja said: What a wonderful effect even the effort of paying respectful obeisance to you has! I only tried to offer my obeisances to you, but that effort proved as successful as the efforts of pure devotees. The causeless mercy that you have shown to me, the fallen demon, has never been received even by the gods or the protectors of the world.
तात्पर्य
जब वामनदेव बाली महाराज के सामने प्रकट हुए, बाली महाराज तुरन्त उन्हें सम्मानपूर्वक नमन करना चाहते थे, लेकिन वह ऐसा करने में असमर्थ थे क्योंकि वहां शुक्राचार्य और अन्य दैत्य साथी उपस्थित थे। हालाँकि, प्रभु बहुत दयालु हैं, और यद्यपि बाली महाराज ने वास्तव में प्रणाम नहीं किया, लेकिन केवल अपने मन में ऐसा करने का प्रयास किया, परम व्यक्तित्व भगवान ने उन्हें इतनी कृपा प्रदान की जितनी कि देवता भी कभी उम्मीद नहीं कर सकते हैं। जैसा कि भगवद गीता (2.40) में पुष्टि की गई है, स्वल्पम् अपि अस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात: "इस मार्ग पर थोड़ी सी भी उन्नति किसी को भी सबसे खतरनाक प्रकार के भय से बचा सकती है।" परम व्यक्तित्व भगवान को भाव-ग्राही जनार्दन के रूप में जाना जाता है क्योंकि वह केवल भक्त के दृष्टिकोण के सार को ही ग्रहण करते हैं। यदि कोई भक्त ईमानदारी से समर्पण करता है, तो प्रभु, जो प्रत्येक के हृदय में परमात्मा के रूप में विराजमान हैं, तुरंत उसे समझते हैं। इस प्रकार, यद्यपि बाह्य रूप से, एक भक्त पूर्ण सेवा प्रदान नहीं कर सकता है, लेकिन यदि वह आंतरिक रूप से ईमानदार और गंभीर है, तो प्रभु फिर भी उसकी सेवा का स्वागत करते हैं। इस प्रकार, प्रभु को भाव-ग्राही जनार्दन के रूप में जाना जाता है क्योंकि वह किसी की भक्ति भावना के सार को लेते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥