हरि नम हरि नम
हरि नमावे केवलम
कलौ नास्त्य एव नास्त्य एव
नास्त्य एव गतिर अन्यथा
"झगड़े और पाखंड के इस युग में भगवान के पवित्र नाम का जाप मुक्ति का एकमात्र साधन है। कोई अन्य तरीका नहीं है। कोई अन्य तरीका नहीं है। कोई अन्य तरीका नहीं है।" (बृहन-नारदीय पुराण 38.126) कलियुग में वैदिक अनुष्ठानों या बलिदानों को पूरी तरह से करना बेहद मुश्किल होता है। मुश्किल से ही कोई वैदिक मंत्रों का उचित उच्चारण कर पाता है या वैदिक अनुष्ठानों की सामग्री जुटा पाता है। इसलिए इस युग में सिफ़ारिश किया गया बलिदान संकीर्तन है, भगवान के पवित्र नाम का लगातार जाप। यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर्यजंति हि सुमेधसः (भाग. 11.5.29)। वैदिक यज्ञ करने में समय बर्बाद करने के बजाय, जो बुद्धिमान हैं, जिनके पास अच्छे दिमाग की क्षमता है, उन्हें भगवान के पवित्र नाम का जाप करना चाहिए और इस तरह पूरी तरह से बलिदान करना चाहिए। मैंने देखा है कि कई धार्मिक नेता यज्ञ करने और अधूरे बलिदान प्रदर्शनों के लिए सैकड़ों और हजारों रुपये खर्च करने के आदी हैं। यह उन लोगों के लिए एक सबक है जो इस तरह के अपूर्ण बलिदानों को अनावश्यक रूप से करते हैं। हमें श्री चैतन्य महाप्रभु (यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर्यजंति हि सुमेधसः) की सलाह पर अमल करना चाहिए। हालाँकि शुक्राचार्य एक सख्त ब्राह्मण थे जो अनुष्ठानों के आदी थे, उन्होंने भी माना, निश्चिद्रम अनुसंकीर्तनं तव: "हे मेरे स्वामी, आपके नाम के पवित्र नाम का लगातार जाप सब कुछ सही कर देता है।" कलियुग में वैदिक अनुष्ठानों को पहले की तरह पूरी तरह से नहीं किया जा सकता है। इसलिए श्रील जीवा गोस्वामी ने सिफ़ारिश की है कि हालाँकि हर तरह की आध्यात्मिक गतिविधि में सभी सिद्धांतों का पालन करने का ध्यान रखना चाहिए, खासकर देवता की पूजा में, फिर भी विसंगतियों की संभावना होती है, और इसकी भरपाई परमेश्वर के पवित्र नाम का जाप करके करनी चाहिए। इसलिए अपने कृष्ण चेतना आंदोलन में हम सभी गतिविधियों में हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने पर विशेष जोर देते हैं।
