हे सर्वमान्य ब्राह्मण शुक्राचार्य! आप यज्ञ करने वाले अपने शिष्य बलि महाराज के उस अपराध या त्रुटि का वर्णन कीजिए, जिसका निराकरण कार्यकुशल ब्राह्मणों की उपस्थिति में विचारोपरान्त किया जाएगा।
O great Brahmin Shukracharya! Please tell us the crime or shortcoming of your disciple Bali Maharaja who was engaged in the yajna. This crime will be resolved by taking a decision in the presence of capable Brahmins.
तात्पर्य
जब बलि महाराज और प्रह्लाद महाराज सुतल लोक चले गए, तो भगवान विष्णु ने शुक्राचार्य से पूछा कि बलि महाराज का क्या दोष था, जिसके लिए शुक्राचार्य ने उनको श्राप दिया था। यह तर्क दिया जा सकता है कि चूंकि बलि महाराज अब दृश्य से हट चुके हैं, तो उनके दोषों का मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है? इसके जवाब में, भगवान विष्णु ने शुक्राचार्य को सूचित किया कि बलि महाराज की उपस्थिति की कोई आवश्यकता नहीं थी, उनके दोषों और विसंगतियों को ब्राह्मणों के समक्ष आंकने पर समाप्त किया जा सकता था। जैसा कि अगले श्लोक में बताया जाएगा, बलि महाराज में कोई दोष नहीं थे; शुक्राचार्य ने अनावश्यक रूप से उन्हें श्राप दिया था। बहरहाल, यह बलि महाराज के लिए बेहतर था। शुक्राचार्य द्वारा शापित किए जाने से, बलि महाराज अपनी सारी संपत्ति से वंचित हो गए, परिणामस्वरूप सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान ने भक्ति सेवा में अपरंपार विश्वास के लिए उन पर कृपा की। निःसंदेह, एक भक्त को फलने वाले कार्यों में संलग्न होने की आवश्यकता नहीं होती है। जैसा कि शास्त्र में कहा गया है, सर्वारहणम अच्युतेज्या (भागवत 4.31.14)। अच्युत अर्थात भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा करके, व्यक्ति सभी को संतुष्ट करता है। क्योंकि बलि महाराज ने भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को संतुष्ट किया था, इसलिए उनके द्वारा किए गए यज्ञों में कोई विसंगतियाँ नहीं थीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥