नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम् ।
मद्दर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धन: ॥ १० ॥
अनुवाद
भगवान ने प्रह्लाद महाराज को आश्वस्त करते हुए कहा कि तुम वहाँ पर हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल लेकर अपने नित्य रूप में मेरा दर्शन कर सकोगे। वहाँ पर मेरे प्रत्यक्ष दर्शन से होने वाले दिव्य आनंद के कारण तुम कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाओगे और तुम्हें किसी भी प्रकार के कर्म-फल की इच्छा नहीं रहेगी।
The Lord assured Prahlada Maharaja that there you will be able to see My eternal form holding a conch, discus, mace and lotus in your hands. By attaining transcendental bliss by seeing Me there continuously, you will not be bound by any more karmic bondage.
तात्पर्य
कर्म-बंध, फलदायी क्रियाकलापों का बंधन, जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति में शामिल होता है। व्यक्ति फलदायी क्रियाकलापों को इस तरह से करता है कि वह अपने अगले जीवन के लिए एक और शरीर बनाता है। जब तक कोई फलदायी गतिविधियों से जुड़ा रहता है, तब तक उसे दूसरा भौतिक शरीर स्वीकार करना चाहिए। भौतिक निकायों को बार-बार स्वीकार करने को संसार बंधन कहा जाता है। इसे रोकने के लिए, एक भक्त को सर्वोच्च भगवान को लगातार देखने की सलाह दी जाती है। इसलिए कनिष्ठाधिकारी, या नौसिखिया भक्त, को हर दिन मंदिर जाने और भगवान के रूप को नियमित रूप से देखने की सलाह दी जाती है। इस तरह से नौसिखिया भक्त को फलदायी गतिविधियों के बंधन से मुक्त किया जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥