श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  8.22.9 
किमात्मनानेन जहाति योऽन्तत:
किं रिक्थहारै: स्वजनाख्यदस्युभि: ।
किं जायया संसृतिहेतुभूतया
मर्त्यस्य गेहै: किमिहायुषो व्यय: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
उस भौतिक शरीर से क्या लाभ जो स्वामी को जीवन के अंत में स्वतः ही छोड़ के चला जाता है? उन सभी परिवार के सदस्यों से क्या लाभ, जो दरअसल उस धन का अपहरण करते हैं जो भगवान की सेवा और आध्यात्मिक संपन्नता में उपयोग हो सकता है? उस पत्नी से क्या लाभ, जो भौतिक दशाओं को बढ़ाने का ज़रिया मात्र है? उस परिवार, घर, देश और समाज से क्या लाभ, जिसमें आसक्त होने से जीवनभर की मूल्यवान ऊर्जा मात्र बर्बाद हो जाती है?
 
उस भौतिक शरीर से क्या लाभ जो स्वामी को जीवन के अंत में स्वतः ही छोड़ के चला जाता है? उन सभी परिवार के सदस्यों से क्या लाभ, जो दरअसल उस धन का अपहरण करते हैं जो भगवान की सेवा और आध्यात्मिक संपन्नता में उपयोग हो सकता है? उस पत्नी से क्या लाभ, जो भौतिक दशाओं को बढ़ाने का ज़रिया मात्र है? उस परिवार, घर, देश और समाज से क्या लाभ, जिसमें आसक्त होने से जीवनभर की मूल्यवान ऊर्जा मात्र बर्बाद हो जाती है?
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