श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  8.22.6-7 
यस्मिन् वैरानुबन्धेन व्यूढेन विबुधेतरा: ।
बहवो लेभिरे सिद्धिं यामु हैकान्तयोगिन: ॥ ६ ॥
तेनाहं निगृहीतोऽस्मि भवता भूरिकर्मणा ।
बद्धश्च वारुणै: पाशैर्नातिव्रीडे न च व्यथे ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
आपके सतत शत्रु रहे अनेक असुरों ने अंततः महान योगियों की सिद्धि प्राप्त की। आप एक ही कार्य कई उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कर सकते हैं; इसी कारण, यद्यपि आपने मुझे अनेक प्रकार से दंडित किया है, परंतु मुझे वरुणपाश में बंदी बनाए जाने का लेशमात्र भी लज्जाबोध नहीं है और न ही मैं कोई कष्ट महसूस कर रहा हूँ।
 
आपके सतत शत्रु रहे अनेक असुरों ने अंततः महान योगियों की सिद्धि प्राप्त की। आप एक ही कार्य कई उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कर सकते हैं; इसी कारण, यद्यपि आपने मुझे अनेक प्रकार से दंडित किया है, परंतु मुझे वरुणपाश में बंदी बनाए जाने का लेशमात्र भी लज्जाबोध नहीं है और न ही मैं कोई कष्ट महसूस कर रहा हूँ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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