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श्लोक 8.22.5  |
त्वं नूनमसुराणां न: परोक्ष: परमो गुरु: ।
यो नोऽनेकमदान्धानां विभ्रंशं चक्षुरादिशत् ॥ ५ ॥ |
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| अनुवाद |
| चूँकि आप हम असुरों के अप्रत्यक्ष रूप से परम सद्इच्छुक हैं, इसलिए हमारी दुश्मनी करने के बावजूद भी आप हमारे सर्वोत्कृष्ट कल्याण के लिए कर्म करते हैं। क्योंकि हम जैसे असुर हमेशा मिथ्या प्रतिष्ठा के पद को पाने की महत्त्वाकांक्षा करते हैं, इस कारण आप हमें दण्डित करके हमारी आँखें खोलते हैं जिससे हम सन्मार्ग देख सकें। |
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| चूँकि आप हम असुरों के अप्रत्यक्ष रूप से परम सद्इच्छुक हैं, इसलिए हमारी दुश्मनी करने के बावजूद भी आप हमारे सर्वोत्कृष्ट कल्याण के लिए कर्म करते हैं। क्योंकि हम जैसे असुर हमेशा मिथ्या प्रतिष्ठा के पद को पाने की महत्त्वाकांक्षा करते हैं, इस कारण आप हमें दण्डित करके हमारी आँखें खोलते हैं जिससे हम सन्मार्ग देख सकें। |
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