श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  8.22.4 
पुंसां श्लाघ्यतमं मन्ये दण्डमर्हत्तमार्पितम् ।
यं न माता पिता भ्राता सुहृदश्चादिशन्ति हि ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि कभी-कभी कोई व्यक्ति का पिता, माता, भाई या मित्र उसके भले के लिए उसे दंडित कर सकते हैं, पर वे कभी भी अपने आश्रित को इस प्रकार दंडित नहीं करते। किंतु आप सर्वोच्च पूजनीय भगवान हैं इसलिए आपने मुझे जो दंड दिया है उसे मैं अत्यंत प्रशंसनीय समझता हूँ।
 
Although sometimes a person's father, mother, brother or friend may punish him because of his well-wishing, they never punish their own dependents in this manner. But since you are the most worshipful Lord, I consider the punishment you have given me to be highly praiseworthy.
तात्पर्य
परमेश्वर द्वारा दिया गया दंड भी भक्तों द्वारा सबसे बड़ी दया माना जाता है|

तत ते'नुकाम्पाँ सुसमीक्षमाणो

भुँजान एवात्म-कृतं विपाकम्

हृद-वाग-वपुर्भिर विदधान नमस ते

जीवेत यो मुक्ति-पदे स दाय-भāk

"वही व्यक्ति जो आपकी सहानुभूति की आशा रखता है और अपने पिछले कर्मों के कारण सभी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों को भी सहन करता है, जो निरंतर आपकी सेवा में अपने मन, वचन और शरीर से लगा रहता है, और हमेशा आपको श्रद्धांजलि अर्पित करता है वह निश्चित रूप से मुक्ति के लिए एक वास्तविक उम्मीदवार है।" (भाग 10.14.8) एक भक्त जानता है कि परमेश्वर द्वारा दिया गया दंड भी उनके द्वारा अपने भक्त को सही करने और उसे सही रास्ते पर लाने के लिए ही एक उपकार है। इसलिए परमेश्वर द्वारा दिए गए दंड की तुलना किसी के भौतिक पिता, माता, भाई या मित्र द्वारा दिए गए सबसे बड़े लाभ से भी नहीं की जा सकती।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)