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श्लोक 8.22.33  |
इन्द्रसेन महाराज याहि भो भद्रमस्तु ते ।
सुतलं स्वर्गिभि: प्रार्थ्यं ज्ञातिभि: परिवारित: ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे बलि महाराज (इन्द्रसेन)! अब तुम सुतललोक जाओ, जिसकी कामना देवता भी करते हैं। वहाँ अपने मित्रों और परिजनों के संग शांतिपूर्वक रहो। तुम्हारा मंगल हो। |
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| हे बलि महाराज (इन्द्रसेन)! अब तुम सुतललोक जाओ, जिसकी कामना देवता भी करते हैं। वहाँ अपने मित्रों और परिजनों के संग शांतिपूर्वक रहो। तुम्हारा मंगल हो। |
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