श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  8.22.31 
एष मे प्रापित: स्थानं दुष्प्रापममरैरपि ।
सावर्णेरन्तरस्यायं भवितेन्द्रो मदाश्रय: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने आगे कहा: उसकी महान सहनशीलता के कारण मैंने उसे वह स्थान दिया है, जो देवताओं को भी नहीं मिल पाता। वह सावर्णि मनु के काल में स्वर्ग के राजा बनेंगे।
 
The Lord further said: Due to his great endurance, I have given him a place which is not available even to the gods. He will become the king of heaven during the period of Savarni Manu.
तात्पर्य
भगवान के इसी दयाभाव के कारण है कि यद्यपि भगवान् किसी भक्त के भौतिक ऐश्वर्य को छीन लेते हैं किन्तु वे उसे तत्काल ही ऐसा पद दे देते हैं जिसका स्वप्न दैवी लोग भी नहीं ले सकते। भक्ति-सिद्धान्त में इसके अनेक उदाहरण हैं। इनमें से एक है सुदामा विप्र की समृद्धि। सुदामा विप्र को भयंकर भौतिक कष्ट सहना पड़ा था किन्तु उन्हें कोई भय नहीं था। वे भक्ति-मार्ग से विचलित नहीं हुए। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें अन्ततः बहुत ऊँचा स्थान मिला। यहाँ mad-āśrayaḥ शब्द का बहुत महत्व है। क्योंकि भगवान बलि महाराज को इन्द्र का परम पद प्रदान करना चाहते थे, तो दैवी लोग स्वाभाविक रूप से उनसे ईर्ष्या करते और उन्हें परेशान करने के लिए लड़ते रहते। किन्तु भगवान ने बलि महाराज को आश्वासन दिया कि वे सदा उनकी सुरक्षा करेंगे (mad-āśrayaḥ)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)