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श्लोक 8.22.25  |
यदा कदाचिज्जीवात्मा संसरन् निजकर्मभि: ।
नानायोनिष्वनीशोऽयं पौरुषीं गतिमाव्रजेत् ॥ २५ ॥ |
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| अनुवाद |
| अपने कर्मों के फलस्वरूप विभिन्न योनियों में जन्म-मरण के चक्र में बार-बार घूमने वाला आश्रित जीव, सौभाग्यवश कभी-कभी मनुष्य शरीर प्राप्त कर सकता है। यह मानव जन्म बहुत ही दुर्लभ है। |
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| अपने कर्मों के फलस्वरूप विभिन्न योनियों में जन्म-मरण के चक्र में बार-बार घूमने वाला आश्रित जीव, सौभाग्यवश कभी-कभी मनुष्य शरीर प्राप्त कर सकता है। यह मानव जन्म बहुत ही दुर्लभ है। |
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