श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  8.22.25 
यदा कदाचिज्जीवात्मा संसरन् निजकर्मभि: ।
नानायोनिष्वनीशोऽयं पौरुषीं गतिमाव्रजेत् ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
अपने कर्मों के फलस्वरूप विभिन्न योनियों में जन्म-मरण के चक्र में बार-बार घूमने वाला आश्रित जीव, सौभाग्यवश कभी-कभी मनुष्य शरीर प्राप्त कर सकता है। यह मानव जन्म बहुत ही दुर्लभ है।
 
The dependent soul roaming the cycle of birth and death in various species due to its own Karmas may get a human body by chance. This human birth is attained very rarely.
तात्पर्य
भगवान पूर्णतः स्वतंत्र हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि जीव के सभी वैभव का खत्म होना उसकी उन पर दया का संकेत हो। भगवान अपनी इच्छानुसार कुछ भी कर सकते हैं। वह वैभव छीन सकते हैं या नहीं भी छीन सकते हैं। जीवन अनेक रूपों में विद्यमान है और भगवान जैसा चुनाव करते हैं, वैसा ही व्यवहार करते हैं। सामान्य रूप से यह मानना होगा कि मानव जीवन बड़ी जिम्मेदारी है।

पुरुषः प्रकृति-स्थो हि

भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान

कारणं गुण-संगोऽस्य

सदसद्योनि-जन्मसु

"भौतिक प्रकृति में सजीव भूत जीवनों के रास्तों पर चलता है और प्रकृति के तीनों गुणों- सत, रज और तम का आनंद लेता है। इसका कारण है कि भौतिक प्रकृति के साथ उसका जुड़ाव है। इस तरह वह विभिन्न प्रजातियों में भले बुरे का सामना करता है।" (भगवद् गीता, १३.२२) जन्म और मृत्यु के चक्र में कई जीवन रूपों में घूमने के बाद, जीव को मानव जीवन का मौका मिलता है। इसलिए हर मनुष्य, खास तौर पर सभ्य राष्ट्र या संस्कृति से संबंध रखने वालों को, अपने कार्यों में अत्यधिक जिम्मेदार होना चाहिए। उसे अगले जीवन में गिरावट का जोखिम नहीं लेना चाहिए। क्योंकि शरीर बदलेगा (तथा देहान्तर-प्राप्तिः) इसलिए हमें अत्यधिक सावधान रहना चाहिए। जीवन का उचित उपयोग देखना कृष्ण चेतना का उद्देश्य है। मूर्ख जीव स्वयं को सभी नियंत्रण से मुक्त घोषित करता है परंतु वास्तव में वह स्वतंत्र नहीं है। वह भौतिक प्रकृति के पूर्ण नियंत्रण में रहता है। इसलिए उसे अपने जीवन के कार्यों में बहुत सावधान और जिम्मेदार होना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)