पुरुषः प्रकृति-स्थो हि
भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान
कारणं गुण-संगोऽस्य
सदसद्योनि-जन्मसु
"भौतिक प्रकृति में सजीव भूत जीवनों के रास्तों पर चलता है और प्रकृति के तीनों गुणों- सत, रज और तम का आनंद लेता है। इसका कारण है कि भौतिक प्रकृति के साथ उसका जुड़ाव है। इस तरह वह विभिन्न प्रजातियों में भले बुरे का सामना करता है।" (भगवद् गीता, १३.२२) जन्म और मृत्यु के चक्र में कई जीवन रूपों में घूमने के बाद, जीव को मानव जीवन का मौका मिलता है। इसलिए हर मनुष्य, खास तौर पर सभ्य राष्ट्र या संस्कृति से संबंध रखने वालों को, अपने कार्यों में अत्यधिक जिम्मेदार होना चाहिए। उसे अगले जीवन में गिरावट का जोखिम नहीं लेना चाहिए। क्योंकि शरीर बदलेगा (तथा देहान्तर-प्राप्तिः) इसलिए हमें अत्यधिक सावधान रहना चाहिए। जीवन का उचित उपयोग देखना कृष्ण चेतना का उद्देश्य है। मूर्ख जीव स्वयं को सभी नियंत्रण से मुक्त घोषित करता है परंतु वास्तव में वह स्वतंत्र नहीं है। वह भौतिक प्रकृति के पूर्ण नियंत्रण में रहता है। इसलिए उसे अपने जीवन के कार्यों में बहुत सावधान और जिम्मेदार होना चाहिए।
