पत्रं पुष्पं फलं तोयं
यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तदहं भक्त्युपहृतम
अश्नामि प्रयत-आत्मन:
ईश्वर अति दयालु हैं कि भक्तिभाव से और कपट रहित होकर निष्कपट मनुष्य भगवान के चरणों में थोड़ा पानी, पुष्प, फल या पत्ता अर्पित करता है, तो प्रभु उन्हें स्वीकार करते हैं। तत्पश्चात् भक्त को वैकुंठ, आध्यात्मिक लोक में पदोन्नत किया जाता है। ब्रह्मा ने प्रभु का इस विषय पर ध्यान आकर्षित किया और उनसे प्रार्थना की कि वह बलि महाराज को मुक्त कर दें, जो वरुण के रस्सियों से बंधे हुए कष्ट झेल रहे थे, और जिन्होंने पहले ही तीनों लोक और उनके पास जो भी था, सब कुछ समर्पित कर दिया था।
