श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  8.22.15 
स तत्र हासीनमुदीक्ष्य सत्पतिं
हरिं सुनन्दाद्यनुगैरुपासितम् ।
उपेत्य भूमौ शिरसा महामना
ननाम मूर्ध्ना पुलकाश्रुविक्लव: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
जब प्रह्लाद महाराज ने देखा कि भगवान श्रीहरि वहाँ पर सुनन्द आदि अपने प्रिय और निजी संगियों के बीच में विराजमान हैं और वे प्रभु की आराधना कर रहे हैं, तो उनके नेत्रों में ख़ुशी के आँसू छलक पड़े। वे भगवान के चरणों में गिर पड़े और अपने सिर को नवाकर उन्हें प्रणाम किया।
 
जब प्रह्लाद महाराज ने देखा कि भगवान श्रीहरि वहाँ पर सुनन्द आदि अपने प्रिय और निजी संगियों के बीच में विराजमान हैं और वे प्रभु की आराधना कर रहे हैं, तो उनके नेत्रों में ख़ुशी के आँसू छलक पड़े। वे भगवान के चरणों में गिर पड़े और अपने सिर को नवाकर उन्हें प्रणाम किया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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