श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  8.22.11 
अथाहमप्यात्मरिपोस्तवान्तिकं
दैवेन नीत: प्रसभं त्याजितश्री: ।
इदं कृतान्तान्तिकवर्ति जीवितं
ययाध्रुवं स्तब्धमतिर्न बुध्यते ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
मैं दैवयोग से ही आपकी शरण में लाया गया हूं और अपने सभी ऐश्वर्य से वंचित हो गया हूं। सांसारिक लोग भौतिक परिस्थितियों में रहते हुए धन-दौलत के मोह के कारण हर पल आकस्मिक मृत्यु का सामना करते हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि यह जीवन नश्वर है। मैं दैवयोग से ही उस स्थिति से बच गया हूं।
 
मैं दैवयोग से ही आपकी शरण में लाया गया हूं और अपने सभी ऐश्वर्य से वंचित हो गया हूं। सांसारिक लोग भौतिक परिस्थितियों में रहते हुए धन-दौलत के मोह के कारण हर पल आकस्मिक मृत्यु का सामना करते हैं, लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि यह जीवन नश्वर है। मैं दैवयोग से ही उस स्थिति से बच गया हूं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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