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श्लोक 8.21.33  |
वृथा मनोरथस्तस्य दूर: स्वर्ग: पतत्यध: ।
प्रतिश्रुतस्यादानेन योऽर्थिनं विप्रलम्भते ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| जिस व्यक्ति ने भिखारी को वचन देकर ठीक से दान न दिया हो उसके स्वर्ग जाने या उसकी इच्छा पूरी होने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती, बल्कि उसे नारकीय जीवन का दुख भोगना पड़ता है। |
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| जिस व्यक्ति ने भिखारी को वचन देकर ठीक से दान न दिया हो उसके स्वर्ग जाने या उसकी इच्छा पूरी होने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती, बल्कि उसे नारकीय जीवन का दुख भोगना पड़ता है। |
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