श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 21: भगवान् द्वारा बलि महाराज को बन्दी बनाया जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  8.21.28 
तं बद्धं वारुणै: पाशैर्भगवानाह वामन: ।
नष्टश्रियं स्थिरप्रज्ञमुदारयशसं नृप ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा! भगवान् वामनदेव ने बलि महाराज, जो अति उदार और प्रसिद्ध थे, से कहा। उन्हें पहले वरुणपाश से बांधा गया था। हालांकि बलि महाराज के शरीर पर कांति नहीं थी, फिर भी वे अपने निश्चय पर अटल थे।
 
O King! Then Lord Vamandev spoke to the very generous and famous Bali Maharaja, whom he had captured with the noose of Varuna. Although Bali Maharaja had lost all his lustre, he was still firm on his decision.
तात्पर्य
जब मनुष्य अपनी सम्पत्ति से हाथ धो बैठता है, निःसंदेह उसके शरीर का भी लावण्य कम हो जाता है। पर यद्यपि राजा बलि महाराज ने सर्वस्व न्योछावर कर दिया था, परन्तु वामनदेव अर्थात् भगवान् के प्रति संतुष्ट करने के अपने निश्चय में वे अडिग थे। भगवद्गीता में ऐसे व्यक्ति को स्थित-प्रज्ञ कहा गया है। मायावी शक्ति की ओर से उत्पन्न समस्त कठिनाइयों और विघ्नों के रहते हुए भी एक निर्मल भक्त भगवान् की सेवा से कभी विचलित नहीं होता। प्रायः सम्पद्-सम्पन्न लोग ही प्रसिद्ध होते हैं, किन्तु राजा बलि महाराज अपनी सम्पत्ति से विहीन होने के कारण चिरकाल के लिए प्रसिद्ध हुए। यही तो भगवान् की अपने भक्तों पर विशेष कृपा है। भगवान् कहते हैं - "यस्याहमनुग्रहणामि हरिष्ये तद्-धनं शनैः" अपनी विशेष कृपा की प्रथम किश्त के रूप में भगवान् अपने भक्त की समस्त सम्पत्ति का हरण कर लेते हैं। परन्तु इस हानि से भक्त कभी विचलित नहीं होता। वह निरन्तर सेवा करता रहता है और भगवान् उसे किसी सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक पुरस्कृत करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)