श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 20: बलि महाराज द्वारा ब्रह्माण्ड समर्पण  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  8.20.34 
पदं द्वितीयं क्रमतस्त्रिविष्टपं
न वै तृतीयाय तदीयमण्वपि ।
उरुक्रमस्याङ्‍‍घ्रिरुपर्युपर्यथो
महर्जनाभ्यां तपस: परं गत: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
सरकार ने दूसरा क़दम रखा तो स्वर्गलोक के मंडल ढक गए। तीसरे क़दम के लिए तो ज़रा-सा भी भूमि अवकाश न रहा क्योंकि सरकार का पग तो महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, यहाँ तक कि सत्यलोक से भी ऊपर तक फैल गया।
 
When God took his second step, all the heavenly realms were included in it. Now not even an iota of land was left for the third step because God's step spread beyond Maharlok, Janlok, Tapolok and even Satyalok.
तात्पर्य
जैसे ही भगवान का कदम महर्लोक, जनलोक तापोलोक और सत्यलोक को पार करते हुए सभी लोकों की ऊँचाई से भी बढ़ गया, उनके नाखून निश्चित ही ब्रह्मांड के आवरण को भेद गये। ब्रह्मांड पंच तत्वों (भूमि, आप, अनल, वायु और खम्) से बना है। शास्त्र के अनुसार, ये तत्व परतों के रूप में हैं और हर परत पिछली परत से दस गुना घनी है। फिर भी भगवान के नाखून इन सभी परतों से भेद गये और आध्यात्मिक दुनिया में एक छेद बना गये। इस छेद से ही इस भौतिक दुनिया में गंगा का पानी आया और इसलिए कहा जाता है, पद-नख-नीर जनित जनपवन (दशावतार-स्तोत्र 5)। क्योंकि भगवान ने ब्रह्माण्ड के आवरण में पैर मारकर छेद किया, इसलिए गंगा का पानी इस भौतिक दुनिया में सभी पतित आत्माओं को उद्धार करने आया।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध आठ के अंतर्गत बीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)