बलि महाराज ने अपने सभी पुरोहितों, आचार्यों और सभा के सदस्यों के साथ भगवान के विश्वरूप को देखा जो छह ऐश्वर्यों से युक्त था। उस शरीर में ब्रह्मांड की सभी चीजें मौजूद थीं - सभी भौतिक तत्व, इंद्रियाँ, इंद्रिय-विषय, मन, बुद्धि, अहंकार, विभिन्न जीव और प्रकृति के तीनों गुणों के कर्म और उनके फल।
Bali Maharaja, along with all his priests, teachers and members of the assembly, saw the cosmic form of the Lord, which was endowed with the six opulences. In that body were present all the things of the universe—all the material elements, the senses, sense-objects, the mind, the intellect, the ego, the various living entities, and the activities of the three modes of nature and their results.
तात्पर्य
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं - अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते | सृष्टि का मूल केवल कृष्ण ही हैं | वासुदेवः सर्वमिति | कृष्ण ही सब कुछ हैं | मत्स्थाने सर्वभूतानि न चाहं तेषु अवस्थितः | सारी वस्तुएं भगवान के विराट स्वरूप में व्याप्त हैं, तथापि भगवान स्वयं सब जगह नहीं हैं | मायावादी दार्शनिक मानते हैं कि क्योंकि भगवान सर्वस्व हैं इसलिये उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है | वे उनके दर्शन को अद्वैतवाद कहते हैं | परंतु उनका दर्शन वास्तविकता में ठीक नहीं है | यहाँ बलि महाराज भगवान के विराट स्वरूप के साक्षात्कारी थे और देखने वाला और देखने योग्य दोनों ही भिन्न-भिन्न हैं | इस तरह द्वैतवाद है | साक्षात्कारी उस विराट स्वरूप का एक अंश मात्र है, वह पूरे विराट के बराबर नहीं हो सकता | अंश और अंशी भी एक हैं, किंतु अंश होने के कारण कभी अंशी के बराबर नहीं हो सकता | यह अचिन्त्यभेदाभेद का दर्शन चैतन्य महाप्रभु का है |
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥