भीषास्माद वाताः पवते
भीषोदेति सूर्यः
भीषास्माद अग्निश्चंद्रश्च
मृत्युर्धा वति पंचमः
(तैत्तिरीय उपनिषद 2.8)
परमेश्वर व्यक्तित्व के भय से ही वायु चल रही है, सूर्य ऊष्मा और प्रकाश का वितरण कर रहा है, और मृत्यु सबका पीछा कर रही है। इस प्रकार, एक परम नियंत्रक है, जैसा कि भगवद् गीता (9.10) में पुष्टि की गई है: 'मायाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सच्चाराचरम।' यह भौतिक अभिव्यक्ति इतनी अच्छी तरह काम कर रही है क्योंकि परम नियंत्रक है। इसलिए, कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति समझ सकता है कि एक परम नियंत्रक है। इसके अलावा, परम नियंत्रक स्वयं भगवान कृष्ण के रूप में, भगवान चैतन्य महाप्रभु के रूप में और भगवान रामचंद्र के रूप में हमें निर्देश देने और उदाहरण द्वारा दिखाने के लिए आते हैं कि कैसे परमेश्वर व्यक्तित्व के प्रति समर्पण किया जाए। फिर भी जो दुष्कृती हैं, जो मनुष्यों में सबसे नीच हैं, वे समर्पण नहीं करते ('ना माम दुष्कृतीनों मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः')।
भगवद् गीता में भगवान स्पष्ट रूप से कहते हैं, 'मृत्युः सर्व-हरश चाहाम': "मैं सर्व-ग्रासी मृत्यु हूं।" इस प्रकार, मृत्यु, या मृत्यु, प्रतिनिधि है जो उस जीवित इकाई से सब कुछ दूर ले जाता है जिसने भौतिक शरीर को स्वीकार कर लिया है। कोई भी यह नहीं कह सकता कि, "मैं मृत्यु से नहीं डरता।" यह एक झूठा प्रस्ताव है। हर कोई मृत्यु से डरता है। हालाँकि, जो परम व्यक्तित्व भगवान का आश्रय लेते हैं, वे मृत्यु से बचाए जा सकते हैं। कोई तर्क दे सकता है, "क्या भक्त नहीं मरता?" इसका उत्तर यह है कि एक भक्त को निश्चित रूप से अपना शरीर त्यागना पड़ता है, क्योंकि शरीर भौतिक है। हालाँकि, अंतर यह है कि जो कृष्ण के प्रति पूरी तरह से समर्पित है और जो कृष्ण द्वारा संरक्षित है, उसके लिए वर्तमान शरीर उसका अंतिम है; उसे फिर से मृत्यु के अधीन होने के लिए भौतिक शरीर प्राप्त नहीं होगा। भगवद् गीता (4.9) में इसका आश्वासन दिया गया है। त्यक्त्वा देहम पुनर्जन्म नैति मम एति सो अर्जुन: एक भक्त, अपने शरीर को छोड़ने के बाद, भौतिक शरीर को स्वीकार नहीं करता, बल्कि घर लौटता है, वापस भगवान के पास। हम हमेशा खतरे में रहते हैं क्योंकि किसी भी क्षण मृत्यु हो सकती है। ऐसा नहीं है कि केवल हाथियों के राजा गजेंद्र ही मृत्यु से डरते थे। हर किसी को मृत्यु से डरना चाहिए क्योंकि हर कोई शाश्वत समय के मगरमच्छ की चपेट में है और किसी भी क्षण मर सकता है। इसलिए, सबसे अच्छा तरीका है कि परमेश्वर व्यक्तित्व भगवान कृष्ण का आश्रय लिया जाए और इस भौतिक दुनिया में अस्तित्व के संघर्ष से बचाया जाए, जिसमें बार-बार जन्म और मृत्यु होती है। इस समझ तक पहुंचना ही जीवन का परम लक्ष्य है।
