श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 2: गजेन्द्र का संकट  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  8.2.31 
इत्थं गजेन्द्र: स यदाप सङ्कटं
प्राणस्य देही विवशो यद‍ृच्छया ।
अपारयन्नात्मविमोक्षणे चिरं
दध्याविमां बुद्धिमथाभ्यपद्यत ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
जब गजेन्द्र ने देखा कि प्रारब्ध के वश वह मगरमच्छ के चंगुल में फँस गया है और परिस्थिति में फँसकर निरीह हो गया है। स्वयं को संकट से बचा नहीं पा रहा है तो मारे जाने के भय से घिर गया। सोच-विचार के बाद उसने यह निश्चय किया।
 
When Gajendra saw that he was in the clutches of a crocodile due to divine will and was helpless due to the situation and could not save himself from the danger, he became very afraid of being killed. As a result, he thought for a long time and finally he reached this decision.
तात्पर्य
भौतिक संसार में प्रत्येक व्यक्ति अस्तित्व के संघर्ष में लगा है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को संकट से बचाने का प्रयास करता है, परंतु जब कोई स्वयं को नहीं बचा पाता, अगर वह पवित्र है, तो वह तभी भगवान के कमल चरणों की शरण लेता है। श्रीमद्भागवद् गीता (7.16) में इसकी पुष्टि की गई है:

चतुर्विधा भजन्ते माँ

जना: सुकृतिनोऽर्जुन

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी

ज्ञानि च भरतर्षभ

चार प्रकार के धर्मी व्यक्ति - अर्थात जो संकट में है, जिसे धन की आवश्यकता है, जो ज्ञान की तलाश में है, और जो जिज्ञासु है - वे बचने या उन्नति करने के लिए भगवान की शरण लेना शुरू करते हैं। हाथियों का राजा, अपने खतरनाक स्थिति में, भगवान के कमल चरणों की शरण लेने का फैसला किया। काफी विचार करने के बाद, वह बुद्धिमानी से इस सही निर्णय पर पहुंचा। ऐसा निर्णय एक पापी व्यक्ति द्वारा नहीं लिया जाता है। इसलिए भगवद्-गीता में कहा गया है कि जो लोग धर्मी (सुकृती) हैं वे यह तय कर सकते हैं कि एक खतरनाक या अजीब सी स्थिति में व्यक्ति को भगवान श्री कृष्ण के कमल चरणों की शरण लेनी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)