ॐ शब्द का उच्चारण करना ही व्यक्ति के धन-धान्य से वियोग का प्रतीक है। दूसरे शब्दों में, ॐ शब्द का उच्चारण करने से व्यक्ति धन के प्रति आसक्ति से मुक्त हो जाता है क्योंकि उसका धन उससे छीन लिया जाता है। लेकिन, धनरहित होना उचित नहीं है क्योंकि ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकता है। दूसरे शब्दों में, ॐ शब्द का उच्चारण करने से व्यक्ति दरिद्र हो जाता है। विशेष रूप से जब कोई किसी गरीब व्यक्ति या भिखारी को दान देता है, तो उसका आत्म-साक्षात्कार और उसकी इंद्रिय संतुष्टि अधूरी रह जाती है।
The very utterance of the word Om indicates the separation of a person from his wealth. In other words, by uttering Om, a person is freed from attachment to wealth because his wealth is taken away from him. But it is not good to be penniless because in such a state a person cannot fulfill his desires. In other words, by uttering the word Om, a person becomes poor. Especially when someone gives alms to a poor person or a beggar, his self-realization and his sense gratification remain incomplete.
तात्पर्य
महाराजा बलि सब कुछ वामनदेव को देना चाहते थे जो भिक्षुक के रूप में आए थे, किंतु शुक्राचार्य, जो महाराजा बलि के सनातन परंपरा के आचार्य थे, महाराजा बलि के वचन का सम्मान नहीं कर सके। शुक्राचार्य ने वैदिक प्रमाण दिया कि किसी गरीब व्यक्ति को सब कुछ नहीं देना चाहिए। बल्कि जब कोई गरीब व्यक्ति दान के लिए आता है तो उसे झूठ बोलकर कहना चाहिए, "जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब मैं आपको दे चुका हूँ। मेरे पास और कुछ नहीं है।" ऐसा नहीं है कि उसे सब कुछ दे देना चाहिए। वास्तव में ॐ का अर्थ है ओं तत् सत् पूर्ण सत्य है। ओंकार का अर्थ है धन से सभी प्रकार के मोह से मुक्ति क्योंकि धन केवल परमात्मा के उद्देश्य के लिए खर्च किया जाना चाहिए। आधुनिक सभ्यता की यह प्रवृत्ति है कि गरीबों को दान में धन दिया जाए। ऐसे दान का कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं है क्योंकि हम वास्तव में देखते है कि यद्यपि गरीबों के लिए बहुत से अस्पताल और अन्य संस्थान हैं पर भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार गरीब लोगों का एक वर्ग हमेशा बना रहेगा। भले ही बहुत से दान पुण्य संस्थान हैं, पर मानव समाज से गरीबी को नहीं हटाया जा सका है। इसलिए यहाँ यह अनुशंसा की गई है, भिक्षवे सर्वम ओं कुर्वन् नालं कामेन चात्मने। भिक्षुकों और गरीबों को सब कुछ नहीं देना चाहिए। सबसे अच्छा समाधान कृष्ण भक्ति आंदोलन का है। यह आंदोलन हमेशा गरीबों के प्रति दयालु रहता है, न केवल इसलिए कि यह उन्हें भोजन देता है बल्कि इसलिए भी कि यह उन्हें कृष्ण भक्त बनने की शिक्षा देकर उन्हें ज्ञान देता है। इसलिए हम सैंकड़ों और हजारों केंद्र गरीबों और ज्ञान में कमी वाले लोगों के लिए खोल रहे हैं ताकि उन्हें कृष्ण भक्ति में ज्ञान दिया जा सके और उनके चरित्र को सुधार कर उन्हें सिखाया जा सके कि कैसे नाजायज संभोग, नशाबाजी, मांसाहार और जुए से बचा जाए जो सबसे बड़े पाप कर्म हैं और जिनके कारण लोगों को जन्मों जन्मों तक दुख उठाना पड़ता है। धन का उपयोग करने का सबसे अच्छा तरीका है कि ऐसे केंद्र खोले जाएँ जहाँ सभी आकर रह सकें और अपना चरित्र सुधार सकें। वे बहुत आरामदायक तरीके से रह सकते हैं, उनके शरीर की किसी भी ज़रूरत की कमी नहीं होने पर भी, वे आध्यात्मिक नियंत्रण में रहते हैं, और इस प्रकार वे खुशी से रहते हैं और कृष्ण भक्ति में उन्नति के लिए समय बचाते हैं। अगर किसी के पास धन है तो उसे बेकार में व्यर्थ नहीं करना चाहिए। इसका उपयोग कृष्ण भक्ति आंदोलन को आगे बढ़ाने में होना चाहिए ताकि सभी मानव समाज खुशहाल, समृद्ध और अपने घर वापस भगवान के पास लौटने की आशा वाला हो जाए। इस संबंध में वैदिक मंत्र इस प्रकार है:
पराग वा एतदृक्तम अक्षरं यद् एतद ओं इति तद्यत् किंचिद ओं इति आहात्रेवास्मै तदृच्यते, स यत् सर्व ओं कुर्याद् रिच्यादात्मानं स कामेभ्यो नालं स्यात्।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥