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श्लोक 8.19.39  |
सत्यं पुष्पफलं विद्यादात्मवृक्षस्य गीयते ।
वृक्षेऽजीवति तन्न स्यादनृतं मूलमात्मन: ॥ ३९ ॥ |
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| अनुवाद |
| वेदों में कहा गया है कि शरीर रूपी वृक्ष का सच्चा फल इसके उत्तम फल और फूल हैं। लेकिन अगर शरीर रूपी वृक्ष ही न हो तो फिर इन वास्तविक फलों और फूलों के होने की कोई संभावना नहीं है। यहाँ तक कि अगर शरीर झूठ की नींव पर भी टिका हो तो भी शरीर रूपी वृक्ष के बिना वास्तविक फल-फूल नहीं हो सकते। |
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| वेदों में कहा गया है कि शरीर रूपी वृक्ष का सच्चा फल इसके उत्तम फल और फूल हैं। लेकिन अगर शरीर रूपी वृक्ष ही न हो तो फिर इन वास्तविक फलों और फूलों के होने की कोई संभावना नहीं है। यहाँ तक कि अगर शरीर झूठ की नींव पर भी टिका हो तो भी शरीर रूपी वृक्ष के बिना वास्तविक फल-फूल नहीं हो सकते। |
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