नूनं प्रमत्तः कुरुते विकर्म
यद इंद्रिया-प्रियता आप्रिणोति
न साधु मन्ये यत ात्मनोऽयम
असन्न अपि क्लेशदा आसा देहः
"जब कोई व्यक्ति इंद्रिय तृप्ति को जीवन का उद्देश्य मानता है, तो वह निश्चित रूप से भौतिकवादी जीवन के पीछे पागल हो जाता है और सभी प्रकार की पापपूर्ण गतिविधियों में संलग्न हो जाता है। वह नहीं जानता कि अपने पिछले कुकर्मों के कारण उसे पहले से ही एक शरीर मिल चुका है, जो अस्थायी होने के बावजूद उसके दुख का कारण है। वास्तव में जीव को भौतिक शरीर नहीं लेना चाहिए था, लेकिन इंद्रिय तृप्ति के लिए उसे भौतिक शरीर प्रदान किया गया है। इसलिए मैं नहीं समझता कि एक बुद्धिमान व्यक्ति इंद्रिय तृप्ति की गतिविधियों में खुद को फिर से शामिल करे, जिसके द्वारा उसे लगातार एक के बाद एक भौतिक शरीर मिलते रहते हैं।" (भाग. 5.5.4)
इस प्रकार ऋषभदेव के अनुसार, इस भौतिक संसार में मनुष्य ऐसे पागलों की तरह हैं जो ऐसी गतिविधियों में लगे हुए हैं जिन्हें उन्हें नहीं करना चाहिए लेकिन जो वे केवल इंद्रिय तृप्ति के लिए करते हैं। ऐसी गतिविधियाँ अच्छी नहीं हैं क्योंकि इस तरह व्यक्ति अपने अगले जीवन के लिए एक और शरीर बनाता है, अपनी नापाक गतिविधियों की सजा के रूप में। और जैसे ही उसे एक और भौतिक शरीर मिलता है, वह भौतिक अस्तित्व में बार-बार कष्ट में पड़ जाता है। इसलिए वैदिक संस्कृति या ब्राह्मणवादी संस्कृति सिखाती है कि जीवन में न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करके कैसे संतुष्ट रहना है।
इस सर्वोच्च संस्कृति को सिखाने के लिए वर्णाश्रम-धर्म की सिफारिश की जाती है। वर्णाश्रम विभागों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास का उद्देश्य इंद्रियों को नियंत्रित करना और नंगे आवश्यकताओं से संतुष्ट रहना सिखाना है। यहाँ भगवान वामनदेव, एक आदर्श ब्रह्मचारी के रूप में, बलि महाराज के उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं जिसमें उन्होंने उन्हें कुछ भी देने की पेशकश की थी जो वे चाहते हों। उनका कहना है कि संतोष के बिना कोई भी खुश नहीं हो सकता, भले ही उसके पास पूरी दुनिया या पूरे ब्रह्मांड की संपत्ति हो। इसलिए मानव समाज में ब्राह्मण संस्कृति, क्षत्रिय संस्कृति और वैश्य संस्कृति को बनाए रखा जाना चाहिए, और लोगों को केवल अपनी ज़रूरत के हिसाब से संतुष्ट रहना सिखाया जाना चाहिए। आधुनिक सभ्यता में ऐसी कोई शिक्षा नहीं है; हर कोई अधिक से अधिक संपत्ति अर्जित करने की कोशिश करता है, और हर कोई असंतुष्ट और नाखुश है। कृष्णभावनाभाव आंदोलन इसलिए विभिन्न खेतों की स्थापना कर रहा है, विशेष रूप से अमेरिका में, यह दिखाने के लिए कि जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ कैसे खुश और संतुष्ट रहना है और आत्म-साक्षात्कार के लिए समय बचाना है, जिसे कोई भी महा-मंत्र का जाप करके बहुत आसानी से प्राप्त कर सकता है - हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे रामा, हरे रामा, रामा रामा, हरे हरे।
